सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने कहा है कि वह अपनी ओर से नियुक्त केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (सीईसी) की इस दलील को स्वीकार नहीं करेगा कि सभी पेड़ वन नहीं हैं. कोर्ट ने कहा कि दिल्ली मेट्रो रेल कारपोरेशन (DMRC) को मेट्रो के विस्तार के चौथे चरण के लिए जितने भी पेड़ काटने हैं, उसके लिए वन संरक्षण अधिनियम के तहत विन विभाग से ही मंजूरी लेनी होगी. बता दें कि डीएमआरसी ने एक आवेदन दायर किया था, जिसमें मेट्रो रेल परियोजना के चौथे चरण के निर्माण के लिए होने वाले पेड़ों की कटाई के लिए कोर्ट से इजाजत मांगी गई थी. एरोसिटी से तुगलकाबाद तक 20 किमी लंबी लाइन के लिए लगभग 10,000 पेड़ों को काटना होगा.


डीएमआरसी की याचिका पर सुनवाई कर रहे जस्टिस एल नागेश्वर राव, बीआर गवई और बीवी नागरत्ना की पीठ ने कहा कि इस पूरे मामले में समिति द्वारा अपनाए गए रुख को स्वीकार नहीं किया जा सकता है. हम यह स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं कि सभी लगाए गए पेड़ जंगल नहीं हैं. यह अराजकता की ओर ले जाएगा. यह कौन तय करेगा कि एक पेड़ लगाया गया है या प्राकृतिक रूप से उगाया गया है?
पीठ ने कहा, ‘हम सीईसी द्वारा किए गए इस अनुरोध को स्वीकार नहीं कर रहे हैं कि सभी पेड़ वन नहीं हैं. पीठ ने बस इस बिंदु के प्रभाव को स्वीकार किया जा रहा है. कौन यह पता लगाने जा रहा है कि पेड़ प्राकृतिक है या इसे लगाया गया है.’ गौरतलब है कि डीएमआरसी ने याचिका में दावा किया है कि पेड़ों को काटने की अनुमति नहीं मिलने की वजह से राष्ट्रीय राजधानी में उसकी कुछ परियोजनाओं का निर्माण कार्य रुक गया है और उसे प्रतिदिन 3.5 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है.समिति की ओर से पेश अधिवक्ता एडीएन राव ने तर्क दिया कि पैनल ने 1996 में शीर्ष अदालत के पहले के फैसले के आधार पर स्टैंड लिया था कि एक परियोजना क्षेत्र में लगाए गए पेड़ों को वन के रूप में ब्रांडेड नहीं किया जा सकता है. अदालत ने कहा कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन होना बेहद जरूरी है. पीठ ने सालिसिटर जनरल से कहा, ‘आपको वन संरक्षण अधिनियम के तहत वन विभाग से ही मंजूरी लेनी होगी. हम भारत सरकार को मंजूरी देने के लिए समय देंगे.’
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