छत्तीसगढ़ बघेल सरकार ने दिया देश में सबसे ज्यादा वन अधिकार पट्टा

जल, जंगल और जमीन आदिवासियों की परंपरा एवं संस्कृति का अटूट हिस्सा ही नहीं बल्कि उनकी आजीविका का साधन भी है। आदिकाल से वनों पर निर्भर आदिवासी समाज इसके सानिध्य में ही अपना घरौंदा बनाकर जीवनयापन करता रहा है। विलासिता से दूर, प्रकृति की गोद में अपने अस्तित्व को बचाकर रखा और साथ ही साथ प्रकृति का संरक्षण भी किया। वनोपज हो या अन्य संसाधन, अपने जीवनयापन के लिए ही उन संसाधनों का उपयोग करता रहा। कभी भी दोहन नहीं किया क्योंकि वे प्रकृति को अपना मानते हैं। खुद को इस धरती का वंशज मानने के साथ पेड़-पौधों को देवता मानकर उनकी पूजा करते हैं। वे वनों पर अपना अधिकार समझते हैं।

वक्त के साथ समय बदला, जल, जंगल और जमीन के साथ वनों से मिलने वाली उपज, जंगल के नीचे दबे खनिज संसाधनों पर सबकी नजर गई और फिर क्या था, यहीं से आदिवासी, परम्परागत वनवासी, अतिक्रमणकारी के रूप में संदेह की दृष्टि से देखे जाने लगे। कोई सुनने और समझने वाला नहीं था, इसलिए कइयों के घरौंदे उजड़ गए, बहुतों ने पलायन कर लिया। इस बीच जो कहीं नहीं गए उन्हें वन्यजीवों से ज्यादा खतरा अपनी भूमि से बेदखल होने और घरौंदा टूटने का सताता रहा।

खुले प्रगति के द्वार

अब जबकि प्रदेश के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल स्वयं वन अधिकार मान्यता अधिनियम-2006 के कार्यों की समीक्षा करने के साथ पूर्व में निरस्त दावों की त्रुटियों को सुधार कर वनवासियों को उनके पर्यावरण से जोड़ रहे हैं तब से वन अधिकार पट्टा वितरण के कार्यों में प्रगति आई है। अब परम्परागत वनवासियों, अनुसूचित जनजातियों को अपना घरौंदा टूटने का भय, बेदखल होने का डर नहीं सताता। शासन द्वारा वन अधिकार अधिनियम के अंतर्गत वितरित भूमि में समतलीकरण एवं मेड़ बंधान कार्य, खाद एवं बीज, कृषि उपकरण, सिंचाई के लिए नलकूप, कुआं, स्टापडैम, प्रधानमंत्री आवास से भी लाभान्वित किया जा रहा है। व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकार मान्यता पत्र मिलने से वनग्रामों में प्रगति के द्वार भी खुल गए हैं।

अब तस्वीर भी बदलने लगी

अब यह जंगल गांववालों का हो गया और तस्वीर भी बदलने लगी है। अब इनके गांवों की तस्वीर पहले जैसी नहीं रही। पास में जंगल तो थे लेकिन उन पर इनका हक नहीं था। वन अधिकार मान्यता अधिनियम-2006 के अंतर्गत प्रदेश का पहला सामुदायिक वन संसाधन अधिकार मिलने के बाद गांव की सीमा से लगे वन पर गांववालों का अधिकार हो गया है। उन्हें जंगल पर नैसर्गिक अधिकारों की मान्यता मिल गई है। यहां 5,352 हेक्टेयर क्षेत्र में सामुदायिक वन संसाधन अधिकार की मान्यता दी गई है। ग्रामसभा अधिनियम की धारा 5 के अनुसार वन संसाधनों तक पहुंच को भी विनियमित किया जा सकता है। यह देश में किसी एक गांव को मान्य किए जाने वाला सर्वाधिक क्षेत्र है।

पूरे देश में छत्तीसगढ़ आगे

वन अधिकार अधिनियम 2006 के क्रियान्वयन के मामले में छत्तीसगढ़ राज्य अन्य प्रदेशों की तुलना में आगे है। यहां 4 लाख 41 हजार व्यक्तिगत वन अधिकर दावे स्वीकृत हैं। जून 2020 की स्थिति में प्रदेश में 8 लाख 9760 व्यक्तिगत दावे प्राप्त हुए जिनमें से 4 लाख 22 हजार 539 वितरित किए गए। सामुदायिक वन अधिकार के 35 हजार 558 आवेदन प्राप्त हुए थे, जिनमें से 30 हजार 941 वितरित किए गए। कुल 4 लाख 53 हजार 480 वन अधिकार पत्र वितरित किए जा चुके हैं। छत्तीसगढ़ में 39 लाख 12 हजार 228 एकड़ भूमि वन भूमि के रूप में मान्य किए गए हैं। जो अन्य प्रदेशों से आगे है।