छत्तीसगढ़ में मौजूदा सरकार के 3 साल पूरे होने जा रहे हैं, मतलब दो साल बाद विधानसभा का चुनाव होना है। जाहिर है कि सत्ता पक्ष से ज्यादा विपक्ष को तैयारी की जरुरत है और इसकी शुरुआत दिखने भी लगी है। प्रदेश में धान खरीदी भी एकाद महीने में शुरू होने को है। लिहाजा अब किसानों के हितैषी भी सक्रिय हो गए हैं। छत्तीसगढ़ में खरीफ फसल की खरीदी शुरू होने से पहले ही धान पर रार शुरू हो गई है। भाजपा ने धान की सूखत से हुए नुकसान पर राज्य सरकार को घेरना शुरू कर दिया है। अब सवाल ये आता है कि भाजपा को धान खरीदी के समय ही किसानों की इतनी चिंता क्यों होने लगती है?
पिछले कई महीनों से सिंघू बॉर्डर पर लाखों किसान अपने हक की लड़ाई लड़ रहे हैं, उन पर इन किसान हितैषियों का ध्यान क्यों नहीं जाता? बीजेपी के लिए ये किसान छत्तीसगढ़ में पीड़ित और शोषित रहता है, लेकिन यही किसान जब अपने अधिकारों की बात करता है तो आतंकवादी सिद्ध कर दिया जाता है। तब किसानों के ये शुभचिंतक कहां रहते हैं? उत्तर प्रदेश के लखीमपुर में जब एक मंत्री का बेटा किसानों को रौंद देता है तब किसानों के इन रक्षकों की आंखों पर पट्टी क्यों बंध जाती है?
मंदसौर की घटना नहीं भूला देश
भाजपा का ये दोहरा चेहरा देश ने कई बार देखा है और इसका प्रमाण इतिहास है। मध्यप्रदेश के मंदसौर की घटना हम भूले नहीं हैं। हम देख चुके हैं कि किस तरह किसानों को आवाज उठाने पर गोलियों से भून दिया जाता है। जब किसान अपनी समस्या बताता है तब ये शुभेक्षु गांधी जी के वो तीन बंदर बन जाते हैं जिन्हें न कुछ दिखाई देता है, ना सुनाई देता है और न ही इस तरह की घटनाओं की निंदा होती है। इससे ये समझा जा सकता है कि बीजेपी किसानों की पूछ-परख केवल चुनाव के समय ही करती है।
सरकार की नीतियों से किसान खुशहाल
आज किसानों के ये चिंतक नीति की बात कर रहे हैं। शायद वे भूल रहे हैं कि मौजूदा सरकार की नीतियों की वजह से ही प्रदेश सरकार का धान खरीदी का टारगेट साल दर साल बढ़ता जा रहा है। अपने अंतिम कार्यकाल तक जिस पूर्ववर्ती सरकार का लक्ष्य 56 लाख मीट्रीक टन धान खरीदने का रहता था, आज वर्तमान सरकार की नीतियों की बदौलत ये लक्ष्य 1 लाख मीट्रिक टन तक पहुंच गया है। अब इन हितैषियों को सोसाइटियों के नुकसान की चिंता होने लगी है। ये चिंता वाकई किसानों के लिए है या उनसे मिलने वाले वोट के लिए ? क्योंकि जब तक धान खरीदी होती है तब तक इन्हें किसान पीड़ित और ठगे हुए लगते हैं, नहीं तो उत्तरप्रदेश, दिल्ली बॉर्डर पर जमे किसान, मंदसौर जैसे मामलों में तो किसानों से बड़ा ‘उपद्रवी’ और ‘आतंकवादी’ कोई नहीं !
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