भगवान सूर्य की होगी आराधाना, ऐसे देव जो देते हैं प्रत्यक्ष दर्शन

बिहार समेत पूरा देश छठ पर्व की खुमारी में डूबा है। हिंदू धर्म के सबसे पुराने त्योहारों में से एक छठ पर्व कई मायने में अनूठा है। लोक आस्था के इस महापर्व की शुरूआत हो चुकी है। छठ का पर्व कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष में मानाया जाता है। आज व्रती षष्ठी का पूजन करेंगे। इससे पहले व्रत और पूजन की शुरूआत नहाय-खाय से होती है। इस त्योहार में सूर्योदय और सूर्यास्त का विशेष महत्व है। इसे उद्याचल और अस्ताचल सूर्य भी कहा जाता है। आइए क्रमवार समझें इस पर्व को-

नहाय खाय

छठ पूजा की शुरुआत कार्तिक शुक्ल चतुर्थी तिथि को नहाय खाय से होती है। यह छठ पूजा का पहला दिन होता है, इस दिन नहाय–खाय की रस्म की जाती है। इस दिन व्रती महिलाएं पवित्र नदियों, तलाबों या पोखरों में नहाकर लौकी, चना दाल खाती हैं और पूजा की शुरूआत करती हैं। इस व्रत में षष्ठी के दिन ड़ूबते सूर्य और सप्तमी के दिन उगते सूर्य की पूजा की जाती है।

खरना

खरना छठ पूजा का दूसरा दिन और दूसरी रस्म है। इस दिन व्रती गुड़ की खीर और रोटी खाकर निर्जल व्रत की शुरूआत करते हैं। 3- डूबते सूर्य को अर्घ्य –

डूबते सूर्य को अर्घ्य

इस दिन बड़ी छठ या षष्ठी की पूजा होती है। ये कार्तिक महीने की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन सूर्यास्त के समय डूबते सूर्य (अस्ताचल सूर्य) को अर्घ्य दिया जाता है।

उगते सूर्य को अर्घ्य

ये छठ पूजा की अंतिम रस्म होती है। इस दिन सूर्योदय के समय उगते सूर्य (उद्याचल सूर्य) को अर्घ्य दिया जाता है। उसके बाद व्रत का पारण होता है।

ऐसे देव जो प्रत्यक्ष दर्शन देते हैं

भगवान सूर्य की गिनती उन 5 प्रमुख देवी-देवताओं में की जाती है, जिनकी पूजा सबसे पहले करने का विधान है। मत्स्य पुराण के अनुसार पंचदेव में भगवान सूर्य के अलावा भगवान गणेश, देवी दुर्गा, भगवान शिव, भगवान विष्‍णु की गिनती होती है। छठ पर्व में भगवान सूर्य की पूजा का विशेष महत्व है। भगवान सूर्य एक प्रत्यक्ष देव हैं। यानी ये प्रत्यक्ष दर्शन देते हैं। अन्य देवी देवताओं को तो हम मूर्तियों में पूजते हैं, लेकिन भगवान सूर्य ही ऐसे देव हैं जिनकी पूजा हम प्रत्यक्ष रूप से कर सकते हैं।

प्रकृति पूजा का संदेश

हमारी सनातन परंपरा हमें कई शिक्षा देती है। इसमें प्रकृति की पूजा सारे विश्व के लिए उदाहरण है। सनातन धर्म में जो प्रकृति की पूजा का संदेश दिया गया है, वह सारे संसार के लिए एक शिक्षा है। चाहे वह गोवर्धन पूजा में पर्वत की पूजा हो, गौवंशो की पूजा हो, नदियों की पूजा हो या फिर सूर्य और चंद्रमा की पूजा हो, ये सारी परंपराएं हमें प्रकृति की पूजा और उससे प्रेम का संदेश देती है और बताती है कि प्रकृति की पूजा ही साक्षात् भगवान की पूजा है।