गोबर से बिजली पैदा करने की परियोजना शुरू करने के बाद अब छत्तीसगढ़ के गांव जल्द ही गाय के गोबर से पैदा होने वाली बिजली से जगमगाएंगे। इसके अलावा ग्रामीण औद्योगिक पार्क भी गाय के गोबर से चलेंगे।
छत्तीसगढ़ एकमात्र राज्य है जो न सिर्फ ग्रामीणों और किसानों गोबर खरीद रहा है, बल्कि उसे वर्मीकम्पोस्ट में बदल बाजार में बेचा जा रहा है। मतलब गोबर बेचने वाले को भी फायदा और ऑर्गेनिक खाद से फसलों को भी फायदा। प्रदेश के मुखिया राज्य के तीन जिलों में ‘गोबर से बिजली’ योजना की शुरुआत भी कर चुके हैं।
3 रुपये प्रति यूनिट तक होगी बिजली
एक तरफ दुनिया के सामने ग्लोबल वार्मिंग जैसी विकराल समस्या है और हर कोई हरित ऊर्जा की बात कर रहा है, ऐसे में भूपेश सरकार ने गाय के गोबर से बिजली बनाने और पृथ्वी को हरित बनाने में योगदान देने का फैसला किया। वैज्ञानिकों के मतानुसार गोबर से उत्पन्न बिजली की लागत 2.50 रुपये से लेकर 3 रुपये प्रति यूनिट तक होगी। समान्यत: 20 किलो गोबर 2 किलोवाट बिजली पैदा करने के लिए पर्याप्त मीथेन पैदा करता है।
गौठानों में बिजली संयंत्र
छत्तीसगढ़ के हर गांव में गोबर-टू-बिजली संयंत्र होगा जो गौठानों (गाय आश्रयों) में स्थापित किया जाएगा, “गोधन न्याय योजना के तहत किसानों से खरीदे गए गोबर का उपयोग बिजली पैदा करने के लिए किया जाएगा। इससे न केवल पर्यावरण बल्कि महिला स्वयं सहायता समूहों को भी फायदा होगा जो गोबर खरीदते हैं।
अब तक करीब 102 करोड़ की खरीदी
छत्तीसगढ़ पशुपालकों से 2 रुपए प्रति किलो गोबर खरीदता है और वर्मीकम्पोस्ट 8 रुपए प्रति किलो के भाव से बाजार में बेचता है। राज्य ने अब तक 102.5 करोड़ रुपये से अधिक के ‘गोबर’ खरीदे हैं। गाय के गोबर से बिजली योजना के लिए कच्चा माल इकट्ठा करने की व्यवस्था पहले से ही है।
आत्मनिर्भर बनेगा छत्तीसगढ़
गोबर से बिजली पैदा करने के लिए गौठानों में बायोगैस प्लांट, स्क्रबर और जेनसेट लगाए गए हैं। इन्हीं टैंकों में मीथेन से बिजली का उत्पादन किया जाएगा। गौठानों में जैविक खाद के निर्माण के अलावा बिजली के मामले में अब छत्तीसगढ़ आत्मनिर्भर हो जाएगा और गौठान समिति के साथ महिला स्वयं सहायता समूहों के लाभ और आय को दोगुना कर देगा।
औद्योगिक पार्कों के रूप में गौठानों का विकास
सुराजी गांव योजना के तहत 6000 गांवों में ग्रामीण औद्योगिक पार्कों के रूप में गौठानों का विकास किया गया है। ताकि महिलाओं द्वारा संचालित खाद और अन्य आयोन्मुखी गतिविधियों का उत्पादन किया जा सके।
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