ZEE5 पर स्ट्रीम हो रही फिल्म गमासान रिलीज़ होते ही चर्चा में आ गई है. तिग्मांशु धूलिया के निर्देशन में बनी यह क्राइम ड्रामा बुंदेलखंड की बीहड़ों में बसी है. कहानी असली घटनाओं से प्रेरित बताई जा रही है, हालांकि यह किसी एक व्यक्ति की बायोपिक नहीं है. गमासान मूवी रिव्यू में आज जानेंगे कि यह मैनहंट ड्रामा दर्शकों को बांधे रखने में कितना कामयाब रहा है, और क्या यह फिल्म आपका वीकेंड देखने लायक बना पाती है.
कहानी किस पर टिकी है
फिल्म की जान है आईपीएस अफसर आदित्य सिंह और खूंखार डाकू महाराज के बीच की भिड़ंत. आदित्य का किरदार प्रतीक गांधी ने निभाया है, जबकि महाराज बने हैं अरशद वारसी. महाराज दशकों से बीहड़ के गांवों पर अपना खौफ कायम रखे हुए है. स्थानीय लोग उसे अपराधी कम और एक तरह की ताकत ज्यादा मानते हैं, जिससे पुलिस के लिए उसे पकड़ना आसान नहीं रहा. आदित्य को ऊपर से साफ आदेश मिलता है कि जल्द से जल्द महाराज को या तो सरेंडर कराया जाए या मुठभेड़ में खत्म किया जाए. यहीं से शुरू होता है ताकत, रणनीति और अस्तित्व की लंबी लड़ाई, जिसमें दोनों तरफ के किरदारों की सोच धीरे-धीरे दर्शकों के सामने खुलती है.
फिल्म की पटकथा सीधी रेखा में नहीं चलती. बीच-बीच में फ्लैशबैक के जरिए महाराज के डाकू बनने की वजहें भी दिखाई गई हैं, जिससे उसका किरदार सिर्फ खलनायक बनकर नहीं रह जाता. यही ग्रे शेड कहानी को थोड़ा जटिल और दिलचस्प बनाता है.
एक्टिंग और डायरेक्शन का असली दम
गमासान की सबसे बड़ी ताकत इसके दो मुख्य कलाकार हैं. अरशद वारसी ने महाराज के किरदार में एक अलग ही गंभीरता दिखाई है, जो उनकी अब तक की कॉमिक छवि से बिल्कुल अलग है. उनकी बॉडी लैंग्वेज, बोलने का अंदाज और आंखों की सख्ती किरदार को असरदार बनाते हैं. प्रतीक गांधी भी आईपीएस अफसर के तनाव और दबाव को बखूबी पर्दे पर उतारते हैं. एक ईमानदार अफसर की मजबूरियां और सिस्टम के भीतर की राजनीति दोनों साथ-साथ दिखती हैं.
तिग्मांशु धूलिया की पहचान हमेशा से बीहड़ और सत्ता के खेल पर बनी फिल्मों से रही है, और गमासान में भी वे असली लोकेशन और माहौल को ईमानदारी से दिखाते हैं. धूल भरे रास्ते, टूटे-फूटे गांव और तनावभरी खामोशी फिल्म को एक ठोस बुनावट देते हैं. सिनेमैटोग्राफी बीहड़ के सूखेपन और उसमें छिपे खतरे को अच्छी तरह पकड़ती है. बैकग्राउंड स्कोर ज्यादातर दृश्यों में माहौल बनाने में मदद करता है, हालांकि कुछ जगह यह जरूरत से ज्यादा भारी महसूस होता है.
कहां रह गई कमी
करीब ढाई घंटे की यह फिल्म बीच-बीच में अपनी रफ्तार खो देती है. कई दृश्य जरूरत से ज्यादा खिंचे हुए लगते हैं, खासकर फिल्म का मध्य हिस्सा. सहायक किरदारों को उतनी गहराई नहीं मिल पाई, जितनी कहानी को चाहिए थी. पुलिस टीम के बाकी सदस्य और महाराज के गैंग के लोग ज्यादातर सतही ही रह जाते हैं. कुछ मोड़ पहले से अंदाजा लग जाने वाले हैं, जिससे रोमांच थोड़ा कम हो जाता है. जिन दर्शकों ने डाकू-पुलिस थीम पर पहले भी कई फिल्में देखी हैं, उन्हें कहानी में नयापन कम महसूस हो सकता है. संवाद ज्यादातर असरदार हैं, लेकिन कुछ जगह भारी-भरकम डायलॉगबाजी नाटकीय लगने लगती है.
तकनीकी पक्ष और संपादन
फिल्म की एडिटिंग को थोड़ा और कसा जा सकता था. कुछ दृश्यों को छोटा करके फिल्म की रफ्तार बेहतर बनाई जा सकती थी. वहीं एक्शन सीक्वेंस असली और कच्चे लगते हैं, जो आजकल की ज्यादातर स्टाइलिश एक्शन फिल्मों से अलग अनुभव देते हैं. गोलीबारी के दृश्यों में तकनीकी चमक कम और जमीनी सच्चाई ज्यादा दिखाई गई है, जो फिल्म के मिजाज के साथ मेल खाती है.
क्या गमासान देखने लायक है
अगर आपको गंभीर और जमीनी क्राइम ड्रामा पसंद हैं, तो गमासान एक बार देखी जा सकती है. फिल्म की सबसे बड़ी वजह अरशद वारसी और प्रतीक गांधी का दमदार अभिनय है. लेकिन अगर आप तेज रफ्तार और चौंकाने वाले ट्विस्ट की उम्मीद कर रहे हैं, तो यह फिल्म कुछ हद तक निराश कर सकती है. परिवार के साथ हल्के मनोरंजन के लिए यह सही विकल्प नहीं है, क्योंकि इसमें हिंसा और गंभीर विषयवस्तु शामिल है. कुल मिलाकर गमासान एक सधी हुई, पर असमान गति वाली फिल्म है, जो अपने कलाकारों के दम पर टिकी रहती है और गंभीर सिनेमा पसंद करने वालों को निराश नहीं करेगी.
अस्वीकरण: यह मूवी रिव्यू लेखक की निजी राय पर आधारित है. फिल्म देखने का अनुभव हर दर्शक के लिए अलग हो सकता है.
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