दीपावली जैसा बड़ा त्योहार आ चुका था। बाजार में जिधर देखों सोनपापड़ी के डिब्बे सजे धजे दिखने लगे। लेकिन कॉलोनी में रहने वाले गुप्ताजीको सोनपापड़ी से खास लगाव नहीं था क्योंकि उन्हें शुगर था। लिहाजा सोनपापड़ी की गली में उनका आना जाना ना था। गुप्ता जी प्राइवेट कंपनी में नौकरी करते थे। नौकरी ऐसी मानो कि वर्क लोड के साथ काम का भी प्रेशर उम्र करीब 50 साल हो चुकी थी। उम्रदराज होने के कारण कॉलोनी में इज्जत भी लोग खूब किया करते थे। धनतेरस वाली सुबह गुप्ता जी ऑफिस के लिए निकले। अभी रास्ते के बीच में ही पहुंचे थे कि गुप्ताईऩ जी का वाट्सअप कॉल आ गया। गुप्ताइन बड़ी तेज थी। वो अक्सर गुप्ता जी को ड्यूटी जाने औऱ आने के दौरान ही फोन किया करती थी।
क्योंकि गुप्ताइन को लगता था कि 50 की उम्र में भी कोई आदमी इतना खुश कैसे हो सकता है। कहीं गुप्ता जी का ऑफिस में ही तो चक्कर नहीं। खैर गुप्ता जी भी खूब समझते थी अपनी गुप्ताइन को तो उन्होंने भी कसम खा रखी थी कि रास्ते में फोन तो ना उठाउंगा। लेकिन गुप्ताइन भी कहां मानने वाली थी। एक के बाद दनादन कॉल, आखिर में गाड़ी रोककर गुप्ताजी ने फोन उठाया। गुप्ताइन ने फोन उठते ही कहासुनो जी आते वक्त कुछ मिठाई और पूजा का सामान लेते आना धनतेरस है, इसके बाद की लिस्ट तुम्हें वाट्सअप कर रही हूं।गुप्ताजी बोले ठीक है प्रिये भेजिए। वाट्सअप पर एक लंबी चौड़ी लिस्ट आ जाती है और गुप्ताजी निकल पड़ते हैं दफ्तर की तरफ। दफ्तर पहुंचते ही गुप्ताजी देखते हैं कि पूरा ऑफिस दुल्हन सा चमचमा रहा है। एंट्री गेट, सीढ़िया, लिफ्ट और वाशरुम सब कुछ चकाचक। वहीं लोग भी सजे धजे खूब जंच रहे हैं। खासकर वो लड़के-लड़कियां जो अभी-अभी न्यूअली ज्वाइन किए हैं। गुप्ता जी टेबल पर पहुंचते हैं और अपना काम शुरु करते हैं। मन में सोच रहे होते हैं ।
कि वक्त मिले तो वाट्सअप चेक करुं कि क्या लाना है क्या नहीं। इस उधेड़बुन में लंच का समय कट जाता है। लंच का डिब्बा खोलते ही रोटी में उन्हें गुप्ताइन की शक्ल नजर आ जाती है। तुरंत वो फोन निकालते हैं और लिस्ट देखते हैं। सारा सामान उनके दफ्तर के आसपास ही मौजूद होता है सिवा मिठाई के क्योंकि मिलावटी मिठाई वो ले जाना नहीं चाहते लिहाजा गुप्ताजी सामान का लिस्ट अपने प्यून को पकड़ाते हैं और कहते है तू बस पैक करा दें मैं पेमेंट कर दूंगा और जाते वक्त लेता जाउंगा। प्यून के जाने का बाद बॉस का संदेशा आता है कि धनतेरस है इसलिए स्टाफ 1 घंटा पहले घर जा सकता है लेकिन घर जाने से पहले एचआर के काउंटर से अपना बोनस और मिठाई जरुर ले ले।गुप्ता जी ने देखा कि सभी लोग एचआर केबिन में जाकर अपना डिब्बा और लिफाफा ले रहे थे। गुप्ताजी का भी नंबर आ गया वो भी गए और वेल पैक्ड मिठाई का डिब्बा और बोनस का लिफाफा पकड़ा। एचआर से गुप्ताजी ने पूछा क्यों भाई क्या इस बार भी मिठाई में वहीं अमर बूटी है। एचआर मुस्कुराया औऱ कहा कि बॉस का मन तो जानते ही हैं सोने पर अटका है। आपको रसमलाई मुबारक हो।
घड़ी में 5 बज चुके थे गुप्ता जी ने बैग उठाया और घर की ओर चल पड़े। दफ्तर के लॉबी में आवाज आई गुप्ता सर। पीछे मुड़कर देखा तो प्यून हाथ में थैला लिए खड़ा था। बिल दूसरे हाथ में लटक रहा था। गुप्ता जी ने बिल के पैसे प्यून को दिए और सामान गाड़ी में रखवाया। बोनस और गिफ्ट लेकर गुप्ता जी घऱ को चले। रास्ते में उन्हें ख्याल आया कि घर कौन सी मिठाई लेकर चली जाए। लेकिन बाजार में भीड़ ज्यादा थी। इसलिए उन्होंने दूसरा रास्ता चुना। कार को कच्ची सड़क की तरफ घुमाया। ये रास्ता थोड़ा सुनसान था। गुप्ता जी थोड़ी ही दूर पहुंचे तो कार बिगड़ गई। नेटवर्क भी जाता रहा। अब गुप्ता जी घबराने लगे क्योंकि शाम रात की आगोश में जा रही थी। 6 बज चुके थे। क्या करें. इतने में उन्हें 4 नौजवान दो गाड़ियों में आते दिखें। सभी आकर गुप्ता जी के पास रुक गए। पूछा अंकल कहां जा रहे हो मदद चाहिए क्या। पहले तो गुप्ताजी घबराए और फिर उनसे पूछा क्या मुझे ऑटो स्टैंड तक छोड़ दोगे। लड़कों ने हामी भरी और एक ने गुप्ता जी को अपनी गाड़ी में बिठाया।सामान लेकर वो दोनों निकल लिए ऑटो स्टैंड की तरफ ।
गुप्ता जी ने डरते-डरते सुनसान रास्ता पार किया और ऑटो स्टैंड तक जा पहुंचे। एक आखिरी ऑटो वाला स्टैंड पर गांजा फूंक रहा था। पूछने पर डबल किराया मांगा। फिर भी गुप्ताजी ने हामी भरी और निकल पड़े घर की ओऱ। इतने में श्रीमति जी का कॉल आ धमका। फोन उठाते ही। अरे कहां रह गए. त्यौहार वाले दिन कहा गुम हो.फोन भी नॉट रीचेबल कर दिया है मैं खूब समझती हूं कि बुढ़ापे में क्या हो रहा है। आओ घर तो बताती हूं। इतने में गुप्ताजी ने फोन कट किया। और ऑटो वाले को जल्दी चलने को कहा। जैसे तैसे रात 8 बजे गुप्ता जी सामान के साथ घर पहुंचे । लेकिन दरवाजे पर कदम रखते ही उन्हें याद आया कि मिठाई का डिब्बा तो वो लिए ही नहीं। अब तो श्रीमती जी सारा घर सिर पर उठा लेगी। गुप्ता जी ने सोचा इस मामले में पड़ोसियों की मदद ली जाए तो अच्छा। उन्होंने तुरंत अपने पड़ोसी रघुनंदन को बुलाया और कहा यार दुकानें बंद हो चुकी है क्या तुम मेरी छोटी सी मदद करोगे। रघुनंदन ने कहा बोल भाई। गुप्ताजी ने कहा कि भाई मैं मिठाई लाना भूल गया हूं यदि तुमने एक्स्ट्रा डिब्बा लिया हो तो प्लीज मुझे दे दो।
रघु के चेहरे में मुस्कान आ गई वो तुरंत अंदर गया औऱ मिठाई का डिब्बा गुप्ताजी को दे दिया। गुप्ताजी खुशी-खुशी घर के अंदर दाखिल हुए श्रीमति जी को गाड़ी खराब होने का वाक्या बताया। आखिरकार वो मान गई और सभी ने एक साथ पूजा शुरु की। श्रीमति ने पूछा कि भोग के लिए क्या लाए हैं। गुप्ताजी ने रघु का डिब्बा बढ़ाया और कहा खुद देख लो। डिब्बा खुला तो मानो गुप्ताइन के आंखें चढ़ गई। क्योंकि वो एक सोनपापड़ी का डिब्बा था। गुप्ताजी ने जैसे ही देखा कि सोनपापड़ी उन्होंने तपाक से कहा कि भाग्यवान रुको ये गलत डिब्बा है ऑफिस वाला मेरे पास दूसरा है । इत्ते में ऑफिस का मिठाई डिब्बा उन्होंने गुप्ताइन को दिया। डिब्बा खुला तो इस बार गुप्ता जी बेहोश थे क्योंकि इसमे भी उनकी वो प्यारी सोनपापड़ी ही थी जो कि रसमलाई प्रतिष्ठान से मंगवाई गई थी।


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