भारत और यूरोपीय संघ के बीच वर्षों से लंबित मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की प्रक्रिया अब अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच गई है। दोनों पक्ष आज जिस बड़े समझौते की घोषणा कर सकते हैं, उसे कूटनीतिक और व्यापारिक जगत में “मदर ऑफ ऑल डील्स” के नाम से देखा जा रहा है। यह समझौता भारत–यूरोप संबंधों के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है।
यह डील ऐसे समय में सामने आ रही है, जब वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं पुनर्गठित हो रही हैं और देशों के बीच रणनीतिक साझेदारियां तेजी से मजबूत हो रही हैं। भारत और यूरोपीय संघ मिलकर न केवल वैश्विक व्यापार का लगभग पांचवां हिस्सा नियंत्रित करते हैं, बल्कि दोनों क्षेत्रों की संयुक्त जनसंख्या भी दुनिया की एक बड़ी शक्ति का प्रतिनिधित्व करती है।
रक्षा और सुरक्षा सहयोग को मिली प्राथमिकता
इस ऐतिहासिक समझौते से पहले रक्षा सहयोग को लेकर भी अहम बातचीत हुई है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और यूरोपीय संघ की विदेश एवं सुरक्षा मामलों की प्रमुख काजा कालास के बीच हुई बैठक में रक्षा सप्लाई चेन को एकीकृत करने के तरीकों पर विशेष ध्यान दिया गया।
बैठक में भरोसेमंद रक्षा तंत्र के निर्माण, आधुनिक सैन्य क्षमताओं के विकास और भविष्य की सुरक्षा चुनौतियों के लिए तैयार रहने पर विचार हुआ। राजनाथ सिंह ने कहा कि भारत और यूरोपीय संघ रक्षा क्षेत्र में दीर्घकालिक और स्थायी सहयोग चाहते हैं।
शीर्ष नेतृत्व की सक्रिय भूमिका
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो लुइस सैंटोस दा कोस्टा से हैदराबाद हाउस में उच्चस्तरीय बैठक की। यह बैठक भारत–ईयू शिखर सम्मेलन से ठीक पहले हुई, जिससे इस समझौते को मजबूत राजनीतिक समर्थन मिला है।
शिखर सम्मेलन में दोनों पक्ष एक व्यापक रणनीतिक एजेंडा अपनाने पर सहमत हो सकते हैं, जिसमें व्यापार, निवेश, सुरक्षा, डिजिटल सहयोग और सतत विकास जैसे क्षेत्रों को प्राथमिकता दी जाएगी।
19 वर्षों की बातचीत का निष्कर्ष
भारत और यूरोपीय संघ के बीच FTA वार्ता की शुरुआत 2007 में हुई थी। लंबे अंतराल और कई दौर की बातचीत के बाद 2022 में इसे दोबारा शुरू किया गया और अब 2026 में यह प्रक्रिया अपने अंतिम चरण में पहुंच चुकी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता व्यापार बाधाओं को कम करेगा, निवेश को बढ़ावा देगा और भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में एक मजबूत स्थान दिलाएगा।
कुल मिलाकर, यह डील भारत और यूरोपीय संघ के रिश्तों को एक नई रणनीतिक और आर्थिक दिशा देने वाली साबित हो सकती है।
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