मगरमच्छ कैसे बचे को समझाता मूल इलस्ट्रेशन, नदी किनारे धूप सेंकता मगर और पीछे धुंधले आसमान में डायनासोर की परछाई

करीब 6.6 करोड़ साल पहले मेक्सिको के पास एक विशाल उल्कापिंड गिरा था. उसके बाद धरती की करीब तीन-चौथाई प्रजातियां खत्म हो गईं, डायनासोर भी. लेकिन मगरमच्छ के पूर्वज बच निकले. मगरमच्छ कैसे बचे, इसका एक बड़ा जवाब अब लंदन की UCL यूनिवर्सिटी की नई स्टडी ने दिया है.

डायनासोर के खात्मे के बाद मगरमच्छ क्यों बच गए

स्टडी के मुताबिक मगरमच्छ के कुल के जीव हमेशा गर्म जलवायु के पीछे चलते रहे. उल्कापिंड के बाद धूप घटी, फिर भी भूमध्य रेखा के आसपास गर्म इलाके बचे रहे. वहां इन्हें शरण मिली. साथ ही छोटा आकार, पानी-ज़मीन दोनों पर जीना, कुछ भी खा लेना और कम ऊर्जा की ज़रूरत ने भी मदद की.

UCL की नई स्टडी से जुड़ी अहम जानकारी

  • कहां छपी: साइंस एडवांसेज़ जर्नल में, 21 अक्टूबर 2026 को.
  • किसने की: UCL के एल्फियो एलेसांद्रो कियारेंज़ा और फिलिप मैनियन की टीम.
  • किस पर: मगरमच्छ वंश की 400 से ज़्यादा जीवित और विलुप्त प्रजातियां.
  • कितना डेटा: 7,000 से ज़्यादा जीवाश्म रिकॉर्ड और 24.5 करोड़ साल के जलवायु मॉडल.
  • नतीजा: ये जीव जलवायु के हिसाब से खुद कम बदले, ज़्यादातर अपनी जगह बदलते रहे.

मगरमच्छ कैसे बचे: गर्मी के पीछे चलने वाली रणनीति

सबसे पहले नाम समझिए. वैज्ञानिक मगरमच्छ वंश को स्यूडोसुकिया कहते हैं. इसमें आज के मगरमच्छ, घड़ियाल और एलिगेटर के साथ उनके विलुप्त रिश्तेदार भी आते हैं. यह वंश 24 करोड़ साल से भी ज़्यादा पुराना है.

दरअसल स्टडी में एक पैटर्न बार-बार दिखा. जब धरती गर्म हुई, तो ये जीव ध्रुवों की तरफ फैल गए. वहीं जब धरती ठंडी हुई, तो वे भूमध्य रेखा की ओर सिमट आए. यानी उन्होंने नई ठंड से लड़ने के बजाय अपनी पसंद की गर्मी का पीछा किया.

इसका सबसे दिलचस्प उदाहरण करीब 5 करोड़ साल पहले का है. उस दौर में धरती आज से करीब 10 डिग्री सेल्सियस गर्म थी. तब इनके रिश्तेदार उत्तरी अमेरिका और यूरोप के ऊंचे अक्षांशों तक पहुंच गए थे. यहां तक कि अंटार्कटिका में भी इनकी मौजूदगी के सबूत हैं.

उल्कापिंड गिरने के बाद धरती पर क्या हुआ था

दरअसल उल्कापिंड की टक्कर से आसमान में धूल और राख भर गई. इससे सूरज की रोशनी कम पहुंचने लगी और ‘इम्पैक्ट विंटर’ यानी अचानक ठंड का दौर आया. ऐसे में ठंड बर्दाश्त न कर पाने वाले जीवों के लिए जगह घट गई.

इसलिए शोधकर्ताओं ने कंप्यूटर पर इस हालात के कई रूप बनाए. अगर धूप 5% या 10% घटी, तब भी भूमध्य रेखा के आसपास गर्म शरणस्थल बचे रहे. सिर्फ 15% की बहुत ज़्यादा गिरावट में ऐसी जगहें खत्म हुईं. हालांकि टीम इस चरम हालात को कम संभावित मानती है.

दूसरी तरफ इसी टीम के पुराने काम में दिखा था कि ऐसे हालात में गैर-पक्षी डायनासोर के रहने लायक इलाके कहीं ज़्यादा सिकुड़ गए थे. यही फर्क इस कहानी की चाबी है.

गर्मी के अलावा और क्या काम आया

ध्यान रहे कि शोधकर्ता खुद कहते हैं कि अकेली गर्मी पूरा जवाब नहीं है. इनकी कुछ आदतें भी काम आईं.

  • छोटा आकार, जिससे कम खाने में गुज़ारा हो सके.
  • आधा पानी और आधा ज़मीन वाला जीवन.
  • मछली से लेकर छोटे जानवर तक, कुछ भी खा लेने की आदत.
  • ठंडे खून वाला शरीर, जिसे गर्म खून वाले जीवों से काफी कम ऊर्जा चाहिए.

इसके अलावा रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक ये जीव लंबे समय तक बिना खाए रह सकते हैं. बहुत गर्मी या ठंड में ये सुस्ती वाली अवस्था में भी जा सकते हैं.

दो मौके, जब इन्होंने आदत बदली भी

हालांकि हर बार कहानी सिर्फ जगह बदलने की नहीं रही. करीब 9.4 करोड़ साल पहले धरती बहुत गर्म थी. उस दौर में आज के मगरमच्छों की ओर जाने वाली एक शाखा ने ज़्यादा गर्मी सहने की क्षमता विकसित की.

फिर करीब 3.4 करोड़ साल पहले ऑस्ट्रेलिया सूखने लगा. तब वहां के एक समूह ने सूखे इलाकों के मुताबिक खुद को ढाल लिया. यानी ज़रूरत पड़ने पर बदलाव भी हुआ, पर ऐसा कम ही हुआ.

भारत के मगरमच्छ और आज की चिंता

भारत में मगरमच्छ कुल की तीन प्रजातियां मिलती हैं, मगर यानी दलदली मगरमच्छ, खारे पानी का मगरमच्छ और घड़ियाल. छत्तीसगढ़ में जांजगीर-चांपा जिले का कोटमी सोनार मगरमच्छ पार्क इन जीवों को करीब से देखने की जगह के रूप में जाना जाता है.

अब स्टडी की चेतावनी पर ध्यान दें. पहले मगरमच्छ गर्मी के साथ नए इलाकों में फैल जाते थे. लेकिन आज सड़कें, खेत और शहर उनका रास्ता रोकते हैं. इसलिए बदलती जलवायु में उनके लिए नई जगह तक पहुंचना मुश्किल हो सकता है.

तो अगली बार किसी नदी किनारे धूप सेंकता मगर दिखे, तो याद रखिए कि यह 24 करोड़ साल की यात्रा का मुसाफिर है. मगरमच्छ कैसे बचे, इसका जवाब उसी धूप की तलाश में छिपा है. साथ ही यह समझ भी ज़रूरी है कि मगरमच्छ कैसे बचे रहें, यह अब काफी हद तक इंसानों पर निर्भर है.

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