बस्तर अपनी अनूठी संस्कृति और परंपराओं के लिए जाना जाता है। अनोखी परंपराओं को समेटे हुए बस्तर लोगों को यहां की संस्कृति की ओर आकर्षित भी करता है। चाहे गोंचा पर्व की बात करें या फिर विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा की, सभी के रीति रिवाज अपने आप में एक विशेषता रखता है। ऐसी ही एक परंपरा बस्तर दशहरा की है। वैसे तो 75 दिनों तक चलने वाले इस महा उत्सव की हर एक परंपरा निराली है, लेकिन मुरिया दरबार परंपरा होने के साथ समस्याओं के समाधान का साधन भी है।

मुरिया दरबार एक विश्वसनीय दरबार है, जहां ग्रामीणों की हर मांगे पूरी होती है। विश्व प्रसिद्ध ऐतिहासिक बस्तर दशहरा उत्सव के तहत आयोजित होने वाले इस मुरिया दरबार रियासतकालीन और लोकतांत्रिक परंपरा का एक अद्भुत मेल है। इस दरबार के जरिए ग्रामीण अपनी समस्याओं को राजा के सामने रखते हैं, जिसके बाद बस्तर नरेश उन समस्याओं का निदान करते हैं।

लोकतांत्रिक परंपरा में बदली रियासतकालीन परंपरा

करीब 700 साल के गौरवशाली इतिहास को संजोए ये रियासतकालीन परंपरा आज भी कायम है। राजघरानों के समय में ये दरबार ग्रामीणों के लिए अपनी परेशानियों को रखने का एक जरिया था, जो आज भी बना हुआ है। हालांकि तब के और अब के मुरिया दरबार में कुछ बदलाव हुए हैं। रियासतकाल में आदिवासियों की समस्या महाराजा सुनते थे, अब ये सब लोकतांत्रिक परंपरा के तहत हो रहा है। मौजूदा समय में प्रदेश के मुखिया यानी मुख्यमंत्री मुरिया दरबार में शामिल होते हैं और ग्रामीणों की समस्या सनते हैं। दरबार में सीएम के साथ पूरा प्रशासनिक तंत्र होता है। साथ ही बस्तर के राजा भी इस दरबार में लोगों की समस्याएं सुनते हैं।

परंपरा के जरिए उम्मीदों की पूर्ति

ये परंपराएं हमें काफी कुछ सिखाती भी हैं। खुद सीएम भी कहतें हैं कि बस्तर दशहरे की कई विशेषताएं हैं, जिसके कारण देश-विदेश के लोग हर साल इसमें शामिल होने के लिए बस्तर आते हैं। शासन-प्रशासन और पूरे बस्तर संभाग के लोग जिस तरह एकजुटता और आपसी सहयोग के साथ 75 दिनों तक चलने वाले इस आयोजन को सफल बनाते हैं, ये भी बस्तर दशहरे की एक विशेषता है। वर्तमान समय में लोगों को एकजुट रखने के लिए इन संस्कृति और परंपराओं की बेहद आवश्यकता है। और ये हमारी सबसे बड़ी ताकत भी है। छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के पीछे अपनी संस्कृति और परंपरा को बचाए रखने की चिंता भी एक बड़ा कारण थी। आज इन परंपराओं के चलते ही हमारा प्रदेश आगे बढ़ रहा है और नवा छत्तीसगढ़ गढ़ रहा है।