छत्तीसगढ़ में चल रही मुख्यमंत्री की लड़ाई थमने का नाम नहीं ले रही है। एक ओर स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही से प्रदेश में एक के बाद एक मौतें हो रही है, लेकिन इससे बेपरवाह, महत्वकांक्षा के मारे जिम्मेदार दिल्ली परिक्रमा में व्यस्त हैं।
राजा साहब की कप्तान बनने की कसक उन्हें अपनी जिम्मेदारियों से दूर कर रही है। क्या बाबा के लिए जनता से ज्यादा सिंहासन मायने रखता है? माइक के सामने तो अपनी जिम्मेदारियों को निभाने की बात कही जाती है। हाईकमान की दुहाई दी जाती है। लेकिन असल में जब कभी एमरजेंसी की स्थिति होती है तो जिम्मेदार मुंह फेर लेते हैं। कप्तानी की चाह में विभाग पर सरगुजा महाराजा की कमांड कमजोर हो रही है।
जिम्मेदारियों पर हावी हुई महत्वकांक्षा
इंतेहा की ये घड़ी बाबा के लिए परेशानी का सबब साबित हो रही है। सरगुजा नरेश की महत्वकांक्षा उनकी जिम्मेदारियों पर हावी हो चुकी है। इसका प्रमाण पंडो जनजाति के लोगों की मौत देती है। महीनों बीत जाते हैं उसके बाद भी बाबा को दिल्ली दौड़ने से फुर्सत नहीं मिलती। इतनी बड़ी संख्या में लोगों की मौत होने के बाद भी स्वास्थ्य मंत्री का वहां ना जाना कई सवाल खड़ा करता है।
सत्ता की भूख के आगे सब धुंधला
इसी तरह अंबिकापुर में नवजात शिशुओं की मृत्यु हो जाती है और जानकारी लगने के बाद भी अपनी इच्छापूर्ति के लिए कोई व्यक्ति दिल्ली की परिक्रमा के लिए निकल जाता है। अब इसे असंवेदनशीलता कह लें या फिर कुर्सी की लालच। सरगुजा महाराजा को सत्ता की भूख के आगे सब कुछ धुंधला सा दिख रहा है।
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