बैतूल: भारत को परम्पराओं का देश माना जाता है। इसलिए हमारे देश में कई तरह की परंपरा निभाई जाती है। कुछ रीति -रिवाज अजीबो-गरीब भी होते हैं। कुछ ऐसा ही देखने को मिला मध्य प्रदेश के बैतूल जिला के सेहरा गांव में वहां के लोग खुद को पांडवों का वंशज मानते हैं। वो लोग भगवान को खुश करने के लिए कांटे की सेज पर लेट जाते हैं। गांव के लोग खुद को तकलीफ दे कर सच की परीक्षा देते हैं उनका कहना है की ये करने से उनकी मन्नते पूरी होती हैं।

ऐसे अनोखे रिवाज रज्जड़ समाज के लोग निभाते हैं। मध्य प्रदेश के बैतूल जिला के सेहरा गांव के लोगों का कहना है की प्राचीन काल में पांडवो ने कुछ ऐसे ही कांटो में लेट कर सत्य की परीक्षा दी थी। उनकी इस परम्परा को उनके वंशज कई सालों से निभा रहे हैं। ये करने से देवी मां खुश होती हैं और उनकी मनोकामना पूरी करती है। इसके अलावा यह भी मान्यता है कि इस कार्यक्रम के बाद वे अपनी बहन कि विदाई करते हैं. रज्जड़ समाज के ये लोग पूजा करने के बाद नुकीले कांटों की झाड़ियां तोड़कर लाते हैं और फिर उन झाड़ियों की पूजा की जाती हैं।

गाँव के लोग इसके बाद एक-एक करके नंगे बदन कांटों की सेज पर लेटकर सत्य और भक्ति का परिचय देते हैं। इस मान्यता के पीछे एक कहानी यह है कि एक बार पांडव पानी के लिए भटक रहे थे। बहुत देर बात उन्हें एक नाहल समुदाय का एक व्यक्ति दिखाई दिया। पांडवों ने उस नाहल से पूछा कि इन जंगलों में पानी कहां मिलेगा, लेकिन नाहल ने पानी का स्रोत बताने से पहले पांडवों के सामने एक शर्त रख दी। नाहल ने पांडवो के सामने ये शर्त रखी कि पानी का स्रोत बताने के बाद उनको अपनी बहन की शादी भील से करानी होगी। पांडवों की तो कोई बहन थी नहीं तब उन्होंने एक भोंदई नाम की लड़की को अपनी बहन बना लिया और पूरे रीति-रिवाजों से उसकी शादी नाहल के साथ करा दी। विदाई के वक्त नाहल ने पांडवों को कांटों पर लेटकर अपने सच्चे होने की परीक्षा देने को कहा। इस पर सभी पांडव एक-एक कर कांटों की सेज पर लेट गए और अपनी बहन को खुशी-खुशी नाहल के साथ विदा किया।

इसलिए रज्जड़ समाज के लोग अपने आपको पंड़वों का वंशज कहते हैं और कांटों पर लेटकर परीक्षा देते हैं। परंपरा पचासों पीढ़ी से चली आ रही है, जिसे निभाते वक्त समाज के लोगों में खासा उत्साह रहता है।