ईरान संघर्ष के चलते वैश्विक राजनीति में नई हलचल देखने को मिल रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने NATO को लेकर एक बार फिर कड़ा रुख अपनाते हुए संकेत दिए हैं कि अमेरिका इस महत्वपूर्ण सैन्य गठबंधन से अलग हो सकता है।
एक हालिया इंटरव्यू में ट्रंप ने साफ तौर पर कहा कि ईरान के खिलाफ कार्रवाई के दौरान NATO देशों ने अमेरिका का साथ नहीं दिया। इससे नाराज होकर उन्होंने गठबंधन की उपयोगिता पर ही सवाल खड़े कर दिए। ट्रंप ने यहां तक कहा कि अब अमेरिका के NATO में बने रहने का कोई खास मतलब नहीं रह गया है।
ईरान संघर्ष बना विवाद की जड़
जब अमेरिका और इस्राइल ने ईरान पर सैन्य कार्रवाई शुरू की, तब यह उम्मीद जताई जा रही थी कि NATO और यूरोपीय देश अमेरिका के समर्थन में खड़े होंगे। लेकिन ज्यादातर देशों ने इस संघर्ष से दूरी बना ली और इसे अमेरिका का एकतरफा कदम बताया। इसी वजह से ट्रंप की नाराजगी खुलकर सामने आई है।
ट्रंप की पुरानी नाराजगी
डोनाल्ड ट्रंप पहले भी NATO को लेकर कई बार असंतोष जता चुके हैं। 2016 के चुनाव अभियान से ही उन्होंने इस गठबंधन को “पुराना” और “अप्रभावी” बताया था। 2018 में उन्होंने सदस्य देशों को रक्षा खर्च बढ़ाने की चेतावनी दी थी, जबकि 2024 के चुनाव प्रचार में उन्होंने स्पष्ट कहा था कि अमेरिका उन देशों की रक्षा नहीं करेगा, जो अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाते।
क्या है NATO और क्यों अहम है?
NATO दुनिया का सबसे बड़ा सैन्य गठबंधन है, जिसका मकसद सदस्य देशों की सामूहिक सुरक्षा सुनिश्चित करना है। इसका सिद्धांत है कि एक देश पर हमला सभी पर हमला माना जाएगा। ऐसे में अमेरिका का इससे अलग होना वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।
अमेरिका के बाहर होने पर क्या असर पड़ेगा?
अगर अमेरिका NATO से अलग होता है, तो यूरोप की सुरक्षा व्यवस्था कमजोर हो सकती है। रूस जैसे देशों की ताकत बढ़ सकती है और अंतरराष्ट्रीय शक्ति संतुलन बदल सकता है। साथ ही, अमेरिका की वैश्विक नेतृत्व क्षमता पर भी असर पड़ सकता है।
कितना आसान है NATO छोड़ना?
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका के लिए NATO से बाहर निकलना केवल राजनीतिक फैसला नहीं है, बल्कि इसके लिए कानूनी प्रक्रियाएं भी पूरी करनी होंगी। इसमें अमेरिकी संसद (कांग्रेस) की भूमिका भी महत्वपूर्ण रहेगी।
ट्रंप के इस बयान ने एक बार फिर दुनिया की सुरक्षा व्यवस्था और गठबंधनों के भविष्य को लेकर बहस तेज कर दी है।
