अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड डिप्रेशन: एक तरफ चिप्स-बिस्किट के पैकेट, दूसरी तरफ घर की दाल-रोटी और फल की थाली

चिप्स, बिस्किट, इंस्टेंट नूडल्स और मीठे ड्रिंक्स हमारी थाली में चुपचाप बढ़ते गए हैं. अब अमेरिका की एक छोटी स्टडी ने अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड डिप्रेशन के रिश्ते पर नई बहस छेड़ी है. यह ट्रायल JAMA Psychiatry जर्नल में 23 सितंबर 2026 को छपा. हालांकि इसमें सिर्फ 20 लोग शामिल थे, इसलिए इसे अंतिम सच नहीं माना जा सकता.

अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड घटाने से डिप्रेशन पर क्या असर दिखा

यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, सैन फ्रांसिस्को (UCSF) के इस पायलट ट्रायल में डिप्रेशन के मरीजों ने चार हफ्ते पैकेट वाला खाना 85% से ज़्यादा घटाया. इस दौरान डिप्रेशन के तीन अलग पैमानों पर मध्यम से बड़ा सुधार दर्ज हुआ. एंग्जायटी यानी घबराहट के स्कोर भी थोड़े सुधरे. फिर भी शोधकर्ता इसे शुरुआती संकेत ही मानते हैं.

UCSF ट्रायल से जुड़ी अहम जानकारी

  • प्रतिभागी: डिप्रेशन से जूझ रहे 20 वयस्क, जिनमें 19 ने ट्रायल पूरा किया.
  • तरीका: रैंडमाइज़्ड क्रॉसओवर ट्रायल, जिसमें हर व्यक्ति ने दोनों तरह की डाइट आज़माई.
  • अवधि: चार हफ्ते सामान्य खाना और चार हफ्ते कम प्रोसेस्ड खाना.
  • फंडिंग: अमेरिका का नेशनल इंस्टीट्यूट्स ऑफ हेल्थ (NIH).
  • अगला कदम: बड़ी स्टडी के लिए भर्ती 2028 में शुरू करने की योजना.

अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड आखिर होता क्या है

सीधी भाषा में, यह वह खाना है जो फैक्ट्री में कई चरणों से गुज़रकर बनता है. इसमें अक्सर प्रिज़र्वेटिव, कृत्रिम रंग, फ्लेवर बढ़ाने वाले तत्व और ज़्यादा चीनी-नमक होता है. उदाहरण के लिए पैकेट वाले चिप्स, कुकीज़, डोनट, व्हाइट ब्रेड, फ्रोज़न मील और मीठे कोल्ड ड्रिंक्स.

वहीं घर में बनी दाल, सब्ज़ी, रोटी, चावल, दही और ताज़े फल इस श्रेणी में नहीं आते. इसलिए फर्क खाने के नाम से नहीं, उसके बनने के तरीके से तय होता है.

ट्रायल कैसे किया गया

सबसे पहले ऐसे लोगों को चुना गया जिन्हें डिप्रेशन था और जो रोज़ काफी पैकेट वाला खाना खाते थे. साथ ही सभी में कम से कम एक मेटाबॉलिक दिक्कत थी, जैसे हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज़ या बढ़ा हुआ LDL कोलेस्ट्रॉल. प्रतिभागियों की औसत उम्र करीब 44 साल थी और 70% महिलाएं थीं.

इसके बाद मरीजों को रैंडम तरीके से, यानी पर्ची निकालने जैसे ढंग से, दो समूहों में बांटा गया. एक समूह ने पहले चार हफ्ते अपनी आम डाइट रखी. दूसरे ने इसी दौरान प्रोसेस्ड खाना काफी घटाया. फिर दोनों समूहों ने अदला-बदली की. यानी हर व्यक्ति की तुलना उसी से हुई.

अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड डिप्रेशन स्टडी के आंकड़े

स्टडी के सार के मुताबिक, PHQ-9 नाम के डिप्रेशन प्रश्नावली स्कोर में कम प्रोसेस्ड डाइट के दौरान करीब 3 अंकों की कमी दिखी. इसके अलावा डॉक्टर द्वारा आंके जाने वाले MADRS स्कोर और QIDS स्कोर में भी गिरावट दर्ज हुई. ये तीनों अलग-अलग तरीके से डिप्रेशन के लक्षण नापते हैं.

दिलचस्प बात यह है कि ट्रायल का मुख्य सवाल इलाज का असर नहीं था. दरअसल शोधकर्ता पहले यह देखना चाहते थे कि क्या मरीज ऐसी डाइट अपना पाते हैं. डिप्रेशन के स्कोर एक अतिरिक्त, खोजी नतीजा थे.

अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड डिप्रेशन ट्रायल की सीमाएं क्या हैं

यह हिस्सा सबसे ज़रूरी है. सबसे पहले, 20 लोगों का सैंपल बहुत छोटा है. दूसरी बात, ट्रायल ‘ओपन-लेबल’ रहा. मतलब हर मरीज को पता था कि इस महीने उसकी डाइट कौन-सी है, और उम्मीद भी असर डाल सकती है.

इसके अलावा खाने की जानकारी लोगों ने खुद बताई, जिसमें गलती की गुंजाइश रहती है. स्पेन के साइंस मीडिया सेंटर से बात करते हुए टफ्ट्स यूनिवर्सिटी के जोस एम. ओर्दोवास ने कहा कि यह स्टडी सुधार साबित करने के लिए काफी नहीं है. उनके मुताबिक यह अलग करना मुश्किल है कि फायदा प्रोसेसिंग घटने से आया या कैलोरी और पोषक तत्वों में बदलाव से.

अपनी थाली में आज से क्या बदल सकते हैं

अगर आप भी पैकेट वाला खाना ज़्यादा खाते हैं, तो ये छोटे कदम आम सेहत के लिहाज़ से समझदारी भरे हैं:

  • शाम के नमकीन की जगह भुने चने, मूंगफली या मौसमी फल रखें.
  • मीठे पैकेट ड्रिंक की जगह सादा पानी, छाछ या नींबू पानी चुनें.
  • इंस्टेंट नूडल्स की जगह पोहा, उपमा या दलिया जैसे घर के नाश्ते आज़माएं.
  • खरीदते समय पैकेट पर सामग्री की लंबी सूची और अनजान नाम देखें.
  • एक साथ सब छोड़ने के बजाय हर हफ्ते एक चीज़ बदलें.

ध्यान रहे, अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड डिप्रेशन का यह ट्रायल किसी इलाज की सलाह नहीं देता. ये सुझाव डिप्रेशन का इलाज नहीं हैं. ये सिर्फ संतुलित खानपान की आम सलाह हैं.

अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड डिप्रेशन पर पाठकों के सवाल

क्या डाइट बदलकर डिप्रेशन की दवा छोड़ी जा सकती है?

नहीं. यह स्टडी ऐसा कुछ नहीं कहती. दवा या थेरेपी में कोई भी बदलाव सिर्फ डॉक्टर की सलाह से करें.

भारत के लोगों पर यह नतीजा कितना लागू होता है?

फिलहाल कहना मुश्किल है. ट्रायल अमेरिका में खास तरह के मरीजों पर हुआ था. इसलिए भारतीय खानपान और आबादी पर अलग रिसर्च की ज़रूरत है.

मन बहुत उदास रहे तो कहां मदद लें?

अगर लंबे समय से उदासी, नींद की दिक्कत या निराशा है, तो मनोचिकित्सक से मिलें. साथ ही सरकार की टेली-मानस हेल्पलाइन 14416 पर भी बात की जा सकती है.

डिस्क्लेमर: यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी के लिए है. इसे चिकित्सकीय सलाह का विकल्प न मानें. किसी बीमारी, दवा, डाइट या व्यायाम में बदलाव से पहले योग्य डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.

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