पंचायतों के साथ नगरीय निकायों में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण पर सहमति बन गई है। महिलाओं को समान अवसर देने की दिशा में छत्तीसगढ़ सरकार ने रिजर्वेशन पर मुहर लगा दी है। केंद्र सरकार ने राज्यों से इस विषय में अभिमत मांगे थे। इस पर छत्तीसगढ़ ने तो अपनी स्वीकृति दे दी। अब तक 16 राज्यों ने पंचायती राज में 50 प्रतिशत का आरक्षण तय कर रखा है। इसमें आंध्र प्रदेश,असम, बिहार, हिमांचल प्रदेश, झारखंड, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, राजस्थान, तमिलनाडु, त्रिपुरा, उत्तराखण्ड और पश्चिम बंगाल शामिल हैं। अब छत्तीसगढ़ भी महिलाओं के इस अधिकार के साथ खड़ा हुआ है।

वैसे देखा जाए तो फिलहाल राज्य में 14 नगर निगम, 43 नगर पालिका और 112 नगर पंचायत मिलाकर 169 निकायों में 3260 वार्ड हैं। फिलहाल नगरीय निकायों में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण है। इस लिहाज से महिला पार्षदों की संख्या 1076 है। 50 फीसदी आरक्षण लागू होने पर इनकी संख्या बढ़कर 1630 हो जाएगी। यानी शहरों के राजनीतिक समीकरणों से लेकर योजनाओं में महिलाओं की प्राथमिकता बढ़ जाएगी।

महिलाओं पर सिर्फ बातें हुई…

पिछड़े करीब डेढ़ दशक में महिलाओं को समानता दिलाने पर बतें तो कई सारी हुई। कई चर्चाएं हुई। बैठकों का दौर भी चला। विचार-विमर्श हुआ, जिसमें 2007-08 में 33 फीसदी का नतीजा सामने आया। हालांकि पहले से ही नगर निगम की राजनीति से जुड़े कई नेता अपनी जगह पर अपनी मां, पत्नी या घर की किसी महिला सदस्य को आगे करते आए हैं। इसके बाद राशन कार्ड में महिलाओं को मुखिया बनाने का फैसला लिया गया। इस बीच शहरी क्षेत्रों में महिलाओं की सुविधा और सुरक्षा को ध्यान में रखकर कई बड़े फैसले लिए गए।

कमल खिलने के बावजूद पहले क्यों नहीं लागू हुई व्यवस्था ?

छत्तीसगढ़ सरकार ने इस व्यवस्था को मंजूरी देकर ये साबित किया है कि महज बातें करना काफी नहीं है। महिलाओं को वास्त्व में उनका हक दिलाना भी जरूरी है। क्योंकि साल 2016 में केंद्र और राज्य दोनों की कुर्सी पर कमल ही खिला था। उस समय अगर तत्कालीन सरकार चाहती तो ये व्यवस्था लागू कर सकती थी। उस वक्त इसे लागू न करने के पीछे सरकार की कोई मानसिकता थी या कुछ और? इस व्यवस्था से नगर निगम से लेकर पालिका और पंचायतों में आधी संख्या महिलाओं की होगी। जिसका परिणाम ये होगा कि योजनाओं से लेकर फैसलों में महिलाओं की भूमिका होगी। महिलाओं को केंद्र में रखकर योजनाएं बनाई जाएंगी।

बदल सकता है ढांचा

सरकार के इस फैसले से पंचायतों की तरह शहरी इलाकों के नेतृत्व में भी बड़ा बदलाव आएगा। 1994 के बाद से 50 फीसदी आरक्षण के साथ पंचायतों की राजनीति का स्वरुप ही बदल गया है। आज की ज्यादातर विधायक और सांसद पंचायतों की राजनीति कर आगे बढ़ी हैं। अब ये नजारा निकायों में भी देखने को मिलेगा। और केंद्र की ये स्कीम अगर चल पड़ी तो इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता कि इसकी सफलता को देखते केंद्र इसे विधानसभा और लोकसभा में भी पारित कर दे।

इतनी आसान नहीं है राह

हालांकि ये अभी इतना आसान नहीं है। केंद्र की राह इतनी आसान भी नहीं है। अब जो विधेयक 2016 से लंबित पड़ा है वो भला इतनी जल्दी कैसे पारित हो जाएगा। फिर ये हमारा भारत देश है, यहां हर विधेयक विवाद या असहमति का शिकार जरूर होता है। और फिर ये भी जरूरी नहीं कि हर किसी का मत एक हो। हो सकता है कि दिल्ली में बैठी सरकार को इसके लिए अभी लंबा इंतजार करना पड़े। क्योंकि इसके लिए केंद्र को अभी सभी राज्यों से सहमति लेनी होगी। इसके बाद शहरी विकास मंत्रालय विधिवत कानून संसद में लाएगा। इसके पारित होने के बाद राज्य इसे लागू कर सकेंगे।