जगदलपुर में 75 दिनों तक चलने वाले बस्तर दशहरे के लिए रथ निर्माण की प्रक्रिया सोमवार से शुरू हो गई है। इससे पहले रविवार को परंपरा के अनुसार डेरीगड़ाई की रस्म पूरी की गई। बिरिंगपाल गांव के ग्रामीणों ने सीरासार भवन में सरई पेड़ की टहनी को स्थापित किया गया। इसके बाद से विशाल रथ निर्माण के लिए जंगलों से लकड़ी लाने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। बस्तर दशहरे के लिए 20 फीट ऊंचा और 45 फीट लंबा दो मंजिला रथ तैयार किया जाएगा।
12 अनूठी रस्मों को किया जाता है पूरा
मण्डपाच्छादन रस्म की तरह ही इस रस्म को भी पूरा किया गया। साल प्रजाति की दो शाखायुक्त डेरी, एक स्तम्भनुमा लकड़ी जो करीब 10 फीट ऊंची होती है, उसे स्थानीय सिरहसार भवन में स्थापित किया गया है। इसके लिए 15 से 20 फीट की दूरी पर दो गड्ढे बनाए गए। जनप्रतिनिधियों और दशहरा समिति के सदस्यों की उपस्थिति में पुजारी ने हल्दी, कुमकुम, चंदन का लेप लगाकर दो सफेद कपड़े डेरी में बांधे। पूजा रस्मों के साथ दशहरा पर्व निर्विघ्न संपन्न होने की ईश्वर से प्रार्थना की गई।
रथ का निर्माण
डेरीगड़ाई रस्म के साथ ही जंगल से लकड़ी और निर्धारित गांवों से कारीगरों का आना शुरू हो गया है। बस्तर दशहरा के लिए बनने वाले रथ में केवल साल और तिनसा प्रजाति की लकड़ियों का उपयोग किया जाएगा। तिनसा प्रजाति की लकड़ियों से पहिए का एक्सल बनाया जाता है और साल की लकड़ियों से रथ निर्माण होगा। इसे बनाने की जिम्मेदारी झारउमरगांव व बेड़ाउमरगांव के ग्रामीणों की है। वह 10 दिनों में पारंपरिक औजारों से विशाल रथ तैयार करेंगे।
कब होती है बस्तर दशहरे की शुरुआत
बस्तर दशहरा की शुरुआत हरेली अमावस्या से होती है। इस दिन माचकोट जंगल से लाई गई लकड़ी पर पाटजात्रा रस्म पूरी की जाती है। इसके बाद बिरिंगपाल गांव के ग्रामीण सीरासार भवन में सरई पेड़ की टहनी को स्थापित कर डेरीगड़ाई रस्म पूरी की जाती है। । इसमें सभी वर्ग, समुदाय और जाति-जनजातियों के लोग हिस्सा लेते हैं। इस पर्व में बस्तर की माँ दंतेश्वरी माता के प्रति अपार श्रद्धा झलकती है।
इस दिन होती है पूजा संपन्न
इस पर्व में काछनगादी की पूजा का विशेष प्रावधान रहा है। रथ निर्माण के बाद पितृमोक्ष अमावस्या के दिन ही काछनगादी पूजा संपन्न की जाती है। इस पूजा में मिरगान जाति की बालिका को काछनदेवी की सवारी आती है। ये बालिका बेल के कांटों से तैयार झूले पर बैठकर रथ परिचालन और पर्व को सुचारु रूप से शुरू करने की अनुमति देती है। दूसरे दिन गांव आमाबाल के हलबा समुदाय का एक युवक सीरासार में 9 दिनों की निराहार योग साधना में बैठ जाता है।
रथ पर विराजता है मां दंतेश्वरी का छत्र
हर रोज शाम को दंतेश्वरी मां के छत्र को विराजित कर दंतेश्वरी मंदिर, सीरासार चौक, जय स्तंभ चौक व मिताली चौक होते रथ की परिक्रमा की जाती है। रथ में छत्र को चढ़ाने और उतारने के दौरान सशस्त्र सलामी दी जाती है। ये सबकुछ पारंपरिक तरीके से होता है। इसमें कहीं भी मशीनों का प्रयोग नहीं किया जाता है। पेड़ों की छाल से तैयार रस्सी से ग्रामीण रथ खींचते हैं। इस रस्सी को लाने की जिम्मेदारी पोटानार क्षेत्र के ग्रामीणों पर होती है। पर्व के दौरान हर रस्म में बकरा, मछली व कबूतर की बलि दी जाती है।
700 वर्ष पुरानी परम्परा है
रियासत कालीन परम्परा को आज के आधुनिक युग में भी पुरे रीती रिवाज के साथ मनाया जाता है। बस्तर दशहरा पर्व देखने देश विदेश से भी सैलानी जगदलपुर पहुँचते हैं। लेकिन बीते 2 सालों से कोरोना के चलते पर्व में सैलानियों को दूर रखा जा रहा है। इस बार भी बस्तर दशहरा पर्व में भक्तों की भीड़ नहीं होगी।
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