संयुक्त बयान, ब्रिक्स सम्मेलन, नई दिल्ली, ईरान

नई दिल्ली में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से पहले भारत को बड़ी सफलता मिली। ब्रिक्स में सहमति बनाने के लिए लंबी बातचीत चली। यह चर्चा देर रात से शनिवार सुबह करीब चार बजे तक जारी रही। इसके बाद 11 सदस्य देशों ने संयुक्त बयान पर सहमति जताई।

यह सहमति ऐसे समय बनी है, जब कई मुद्दे बेहद संवेदनशील हैं। सदस्य देशों के बीच क्षेत्रीय हित भी अलग-अलग हैं। पश्चिम एशिया का तनाव भी बातचीत को प्रभावित कर रहा था। इसके बावजूद भारत ने संवाद और समन्वय पर लगातार जोर दिया।

चार बजे तक चली बातचीत, फिर बनी साझा राय

संयुक्त बयान को लेकर कई दौर की बातचीत हुई। इसमें सदस्य देशों ने अपने-अपने विचार सामने रखे। कुछ मुद्दों पर मतभेद दूर करना आसान नहीं था।

सरकारी सूत्रों के मुताबिक, बातचीत शुक्रवार देर रात तक जारी रही। इसके बाद चर्चा शनिवार सुबह करीब चार बजे तक चली। भारत ने इस दौरान सभी देशों से लगातार संपर्क बनाए रखा।

भारत ने अलग-अलग देशों की चिंताओं को समझने का प्रयास किया। साथ ही, साझा हितों वाले मुद्दों पर सहमति बनाने की कोशिश की। आखिरकार संयुक्त बयान को लेकर आम राय बन गई।

ईरान, सऊदी और यूएई के मतभेद बने चुनौती

ब्रिक्स में सहमति बनाना इसलिए मुश्किल था, क्योंकि तीन महत्वपूर्ण सदस्य अलग रुख रखते हैं। ईरान, सऊदी अरब और यूएई के बीच कई क्षेत्रीय मतभेद हैं।

  • पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने चुनौती बढ़ाई।
  • क्षेत्रीय मुद्दों पर तीनों देशों के हित अलग हैं।
  • संयुक्त बयान के शब्दों पर संतुलन जरूरी था।
  • भारत ने सभी पक्षों से लगातार बातचीत की।
  • साझा बिंदुओं के आधार पर समाधान खोजा गया।

भारत की कोशिश किसी एक पक्ष का समर्थन करना नहीं थी। उसका जोर सभी देशों को साथ लेकर चलने पर रहा। इससे संवेदनशील मुद्दों पर बातचीत आगे बढ़ी।

भारत ने कैसे बनाई 11 देशों के बीच सहमति?

भारत इस वर्ष ब्रिक्स की मेजबानी कर रहा है। इसलिए संयुक्त बयान पर सहमति बनाना महत्वपूर्ण था। मेजबान देश के रूप में भारत ने सक्रिय भूमिका निभाई।

भारतीय पक्ष ने सदस्य देशों के साथ लगातार विचार-विमर्श किया। उनकी चिंताओं और प्राथमिकताओं को समझा गया। इसके बाद ऐसे बिंदुओं पर ध्यान दिया गया, जिन पर सभी देश साथ आ सकें।

ब्रिक्स में सहमति भारत की इसी संवाद आधारित रणनीति का परिणाम मानी जा रही है। इससे सम्मेलन से पहले सकारात्मक माहौल तैयार हुआ है।

18वें ब्रिक्स सम्मेलन में कौन-कौन शामिल?

भारत 12 और 13 सितंबर को 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है। इसमें 11 सदस्य देशों के नेता शामिल हो रहे हैं। इसके अलावा 10 पार्टनर देशों की भागीदारी भी है।

सम्मेलन में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन शामिल हैं। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी इसमें हिस्सा ले रहे हैं। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान भी सम्मेलन में मौजूद हैं।

इसके अलावा कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों के प्रतिनिधि भी हिस्सा ले रहे हैं। इसलिए इस सम्मेलन का वैश्विक महत्व काफी बढ़ गया है।

संयुक्त बयान पर सहमति क्यों अहम है?

संयुक्त बयान पर सहमति सम्मेलन के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इससे पता चलता है कि मतभेदों के बावजूद संवाद जारी रखा जा सकता है।

ब्रिक्स में सहमति बनने से समूह के साझा एजेंडे को आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी। अब सम्मेलन में कई वैश्विक और आर्थिक मुद्दों पर चर्चा होगी।

पश्चिम एशिया की स्थिति भी बातचीत का अहम विषय बन सकती है। इसके साथ वैश्विक सहयोग से जुड़े मुद्दों पर विचार होगा।

भारत के लिए कितनी बड़ी है यह कामयाबी?

भारत की अध्यक्षता में हुई यह पहल उसकी कूटनीतिक क्षमता दिखाती है। अलग-अलग हितों वाले देशों को एक साझा मंच पर लाना चुनौतीपूर्ण था।

इसके बावजूद भारत ने लगातार संवाद का रास्ता बनाए रखा। इससे संयुक्त बयान पर आम सहमति बनाने में मदद मिली।

ब्रिक्स में सहमति से भारत की कूटनीति को बढ़त

11 देशों को संयुक्त बयान पर एकमत करना आसान नहीं था। ब्रिक्स में सहमति ने भारत की संवाद आधारित कूटनीति को मजबूत किया है। यह सफलता सम्मेलन से पहले भारत के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

कुल मिलाकर, यह उपलब्धि केवल एक संयुक्त बयान तक सीमित नहीं है। यह दिखाती है कि कठिन परिस्थितियों में भी बातचीत से रास्ता निकाला जा सकता है।

 

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