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नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन को लेकर अमेरिका और पश्चिमी देशों की दिलचस्पी बढ़ी है। अमेरिकी मीडिया ने बैठक को बदलती वैश्विक राजनीति से जोड़कर देखा है। रिपोर्टों में भारत और चीन के रिश्तों पर खास ध्यान दिया गया है।

अमेरिकी अखबारों के अनुसार, सम्मेलन कई बड़े सवालों के बीच हो रहा है। इनमें वैश्विक शक्ति संतुलन और अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा प्रमुख हैं। इसके अलावा क्षेत्रीय संघर्ष और ऊर्जा संकट भी चर्चा में हैं।

भारत-चीन रिश्तों पर क्यों टिकी अमेरिका की नजर?

द न्यूयॉर्क टाइम्स ने सम्मेलन को महत्वपूर्ण वैश्विक घटनाक्रम बताया है। रिपोर्ट में मोदी और शी जिनपिंग की भूमिका पर सवाल उठाया गया है। सवाल यह है कि विकासशील देशों की अधिक प्रभावशाली आवाज कौन बनेगा।

चीन ब्रिक्स को अमेरिकी प्रभाव को चुनौती देने वाला मंच मानता है। वहीं भारत संगठन को ज्यादा खुला और व्यापक रखना चाहता है। भारत का प्रयास किसी एक वैश्विक गुट के साथ जुड़ने से बचना है।

चीन की एक बड़ी चिंता भारत और अमेरिका की बढ़ती नजदीकी है। इसलिए बीजिंग भारत के साथ संबंध सुधारने का अवसर तलाश रहा है।

शी जिनपिंग का भारत दौरा सात साल बाद हो रहा है। दोनों देशों के रिश्तों में 2020 के बाद काफी तनाव रहा। हालांकि, 2024 से बातचीत के जरिए सुधार की कोशिश हुई है।

शी जिनपिंग की आगामी अमेरिका यात्रा भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। वह 24 सितंबर को डोनाल्ड ट्रंप से मुलाकात करेंगे। ऐसे में भारत में होने वाली बैठक का रणनीतिक महत्व बढ़ गया है।

ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भारत की संतुलन नीति

वॉल स्ट्रीट जर्नल ने भारत और चीन के लिए नए अवसरों का जिक्र किया है। रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका के साथ रिश्तों में अनिश्चितता बढ़ी है। ऐसे में दोनों पड़ोसी देश तनाव कम करने पर विचार कर सकते हैं।

हालांकि, भारत-चीन संबंधों में कई चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं। सीमा विवाद उनमें सबसे अहम मुद्दा है। इसके अलावा चीन-पाकिस्तान संबंध भी भारत की चिंता बढ़ाते हैं।

हिंद महासागर में दोनों देशों की रणनीतिक प्रतिस्पर्धा भी जारी है। इसलिए मौजूदा सुधार को स्थायी बदलाव मानना जल्दबाजी होगी।

ट्रंप प्रशासन के दौरान बदले भारत-अमेरिका समीकरण

अमेरिकी मीडिया ने भारत-अमेरिका संबंधों में आई गिरावट पर भी चर्चा की है। ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में कई मुद्दों पर मतभेद सामने आए। इनमें भारत की रूसी तेल खरीद भी शामिल है।

भारत अब अपनी विदेश नीति में संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है। वह रूस और ईरान के साथ पुराने संबंध बनाए हुए है। साथ ही अमेरिका और यूरोपीय देशों से साझेदारी भी बढ़ा रहा है।

इसके अलावा जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ भी भारत के संबंध मजबूत हुए हैं। इससे भारत की रणनीतिक स्थिति और महत्वपूर्ण हो जाती है।

  • भारत-चीन संबंधों से जुड़े प्रमुख मुद्दे
    • सीमा विवाद अभी भी बड़ी चुनौती बना हुआ है।
    • चीन और पाकिस्तान की करीबी भारत के लिए चिंता है।
    • हिंद महासागर में रणनीतिक प्रतिस्पर्धा जारी है।
    • अमेरिका और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा का असर पड़ रहा है।
  • ब्रिक्स के सामने प्रमुख चुनौतियां
    • सदस्य देशों के राजनीतिक हित अलग-अलग हैं।
    • आर्थिक प्राथमिकताओं में भी काफी अंतर है।
    • यूक्रेन और मध्य पूर्व के संघर्ष मतभेद बढ़ा सकते हैं।
    • ग्लोबल साउथ को एकजुट रखना आसान नहीं होगा।

बढ़ते समूह के बीच भारत के सामने बड़ी चुनौती

वाशिंगटन पोस्ट में प्रकाशित एपी की रिपोर्ट ने भारत की स्थिति पर ध्यान दिया। रिपोर्ट के अनुसार, विस्तारित समूह में अब 11 सदस्य हैं। सभी देश वैश्विक व्यवस्था में ज्यादा प्रभाव चाहते हैं।

हालांकि, उनके राजनीतिक और आर्थिक हित एक जैसे नहीं हैं। विदेश नीति के मुद्दों पर भी अलग-अलग प्राथमिकताएं हैं। इसलिए सभी देशों को एक मंच पर सहमत करना मुश्किल है।

ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में रूस और ईरान की मौजूदगी भी महत्वपूर्ण है। पीएम मोदी ने सम्मेलन से पहले दोनों देशों के नेताओं से बातचीत की। वहीं चीन के साथ संबंध सुधारने की प्रक्रिया भी जारी है।

कुल मिलाकर, भारत के सामने संतुलन साधने की चुनौती है। उसे रूस और ईरान से संबंध बनाए रखने हैं। साथ ही अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ साझेदारी भी बढ़ानी है।

ऐसे में नई दिल्ली की कूटनीति पर पूरी दुनिया की नजर है। सम्मेलन भारत की बहुपक्षीय रणनीति का महत्वपूर्ण मंच बन गया है।


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