अमेरिका की एक बड़ी स्टडी में चौंकाने वाला कनेक्शन सामने आया है. एंडोमेट्रियोसिस से पीड़ित महिलाओं में टाइप 2 डायबिटीज़ होने का खतरा काफी ज्यादा पाया गया है. जॉर्ज मेसन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने करीब 29 लाख महिलाओं के डेटा का विश्लेषण किया. रिसर्च के मुताबिक एंडोमेट्रियोसिस में डायबिटीज़ का खतरा सामान्य महिलाओं से 46% ज्यादा देखा गया. यह अब तक की इस विषय पर सबसे बड़ी स्टडी मानी जा रही है.
एंडोमेट्रियोसिस में डायबिटीज़ का खतरा कितना बड़ा है
नई स्टडी के मुताबिक एंडोमेट्रियोसिस से पीड़ित महिलाओं में डायबिटीज़ का खतरा 46% ज्यादा है. यह असर खासकर उन महिलाओं में ज्यादा दिखा जिनका मेनोपॉज़ नहीं हुआ है. सामान्य वजन वाली महिलाओं में भी यह खतरा ज्यादा पाया गया. यह नतीजे डायबेटोलॉजिया जर्नल में छपे हैं.
स्टडी के मुख्य निष्कर्ष क्या कहते हैं
- यह स्टडी ‘आर्चेस’ यानी ARCHES रिसर्च का हिस्सा है.
- इसमें 1996 से 2021 तक के मेडिकल रिकॉर्ड शामिल किए गए.
- कुल करीब 29 लाख 39 हजार महिलाओं का डेटा देखा गया.
- इनमें से करीब एक लाख महिलाओं को एंडोमेट्रियोसिस था.
- हर महिला को औसतन करीब 11 साल तक ट्रैक किया गया.
- स्टडी अमेरिका के यूटा पॉपुलेशन डेटाबेस पर आधारित है.
एंडोमेट्रियोसिस क्या होता है
एंडोमेट्रियोसिस एक ऐसी स्थिति है, जिसमें गर्भाशय की परत जैसा टिशू गर्भाशय के बाहर बढ़ने लगता है. इससे पेल्विक में तेज दर्द हो सकता है. कई बार प्रजनन क्षमता पर भी असर पड़ता है. विशेषज्ञों के अनुसार यह हर 10 में से करीब 1 महिला को प्रभावित करती है. यह समस्या ज्यादातर प्रजनन उम्र वाली महिलाओं में देखी जाती है. भारी पीरियड्स, संबंध बनाने के दौरान दर्द और लगातार थकान भी इसके आम लक्षण माने जाते हैं. कई महिलाओं को सही डायग्नोसिस मिलने में सालों लग जाते हैं.
प्रजनन सेहत से आगे भी है इसका असर
लंबे समय से एंडोमेट्रियोसिस को सिर्फ प्रजनन सेहत से जुड़ी समस्या माना जाता रहा है. इस स्टडी के लेखकों का कहना है कि पुरानी रिसर्च में एंडोमेट्रियोसिस को एक ही बीमारी माना गया. इसी वजह से डायबिटीज़ से जुड़ाव साफ नजर नहीं आया था. जब बीमारी को अलग-अलग प्रकार में बांटकर देखा गया, तो नतीजे अलग निकले. इससे यह समझ मजबूत होती है कि एंडोमेट्रियोसिस सिर्फ पेल्विक दर्द या इनफर्टिलिटी तक सीमित नहीं है. यह शरीर के मेटाबॉलिक सिस्टम को भी प्रभावित कर सकती है.
एंडोमेट्रियोसिस में डायबिटीज़ का खतरा किन महिलाओं में ज्यादा
स्टडी में पाया गया कि यह खतरा हर महिला में एक जैसा नहीं है. जिन महिलाओं का मेनोपॉज़ नहीं हुआ, उनमें खतरा ज्यादा था. मेनोपॉज़ के बाद यह असर काफी कम हो गया. हैरानी की बात यह रही कि सामान्य वजन वाली महिलाओं में भी खतरा ज्यादा दिखा. आमतौर पर डायबिटीज़ का खतरा ज्यादा वजन से जोड़ा जाता है. लेकिन इस स्टडी में उल्टा पैटर्न सामने आया. एंडोमेट्रियोसिस के अलग-अलग प्रकार में भी खतरे का स्तर अलग-अलग पाया गया. पेल्विक से बाहर फैली एंडोमेट्रियोसिस में यह खतरा सबसे ज्यादा मिला.
यह खतरा क्यों बढ़ता है: मुमकिन वजह
शोधकर्ताओं के मुताबिक इसकी वजह शरीर में लगातार रहने वाली सूजन हो सकती है. एंडोमेट्रियोसिस हार्मोन से जुड़ी बीमारी है. प्रजनन उम्र के दौरान इसमें सूजन और टिशू ग्रोथ दोनों बढ़ जाते हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि यही सूजन शरीर के मेटाबॉलिज्म को प्रभावित कर सकती है. इससे इंसुलिन के काम करने के तरीके पर असर पड़ सकता है. हालांकि अभी इस मैकेनिज्म पर और रिसर्च जरूरी है.
स्टडी की कुछ सीमाएं भी हैं
यह स्टडी एक बड़ा नमूना होने के बावजूद कुछ सीमाओं के साथ आती है. एंडोमेट्रियोसिस की पहचान अस्पताल के मेडिकल कोड के आधार पर की गई. हर केस सर्जरी से कन्फर्म नहीं हुआ था. एंडोमेट्रियोसिस वाली महिलाएं डॉक्टर के पास ज्यादा जाती हैं, इसलिए उनकी बीमारी जल्दी पकड़ में आ सकती है. शोधकर्ताओं ने खुद माना कि यह सिर्फ कनेक्शन दिखाता है, सीधा कारण नहीं. डाइट और एक्सरसाइज जैसे फैक्टर इस स्टडी में शामिल नहीं थे. यह स्टडी अमेरिकी महिलाओं के डेटा पर आधारित है. भारतीय महिलाओं पर अलग से रिसर्च जरूरी मानी जा रही है. आगे और रिसर्च की जरूरत है ताकि यह पैटर्न पूरी तरह साफ हो सके.
अब महिलाओं को क्या करना चाहिए
अगर किसी महिला को एंडोमेट्रियोसिस की पहचान हो चुकी है, तो ब्लड शुगर की नियमित जांच फायदेमंद हो सकती है. खासकर सामान्य वजन वाली और कम उम्र की महिलाओं को भी सतर्क रहना चाहिए. डॉक्टर से अपनी पारिवारिक हिस्ट्री और लक्षणों पर खुलकर बात करनी चाहिए. समय पर जांच से डायबिटीज़ को शुरुआती स्टेज में पकड़ा जा सकता है. यह स्टडी इस बात की तरफ इशारा करती है कि एंडोमेट्रियोसिस सिर्फ प्रजनन सेहत तक सीमित नहीं है.
जरूरी सवाल-जवाब
क्या एंडोमेट्रियोसिस से डायबिटीज़ हमेशा होता है?
नहीं. स्टडी सिर्फ खतरा बढ़ने की बात कहती है. एंडोमेट्रियोसिस वाली हर महिला को डायबिटीज़ नहीं होता. यह सिर्फ एक जोखिम कारक है, तय नतीजा नहीं.
क्या यह खतरा सिर्फ अमेरिकी महिलाओं पर लागू होता है?
स्टडी अमेरिका के डेटा पर आधारित है. भारतीय महिलाओं पर अलग से रिसर्च जरूरी है. फिर भी सूजन और हार्मोन से जुड़ा यह पैटर्न आमतौर पर दुनियाभर में एक जैसा माना जाता है.
किस उम्र में ब्लड शुगर जांच शुरू करनी चाहिए?
इसका जवाब हर महिला के लक्षण और फैमिली हिस्ट्री पर निर्भर करता है. एंडोमेट्रियोसिस की पहचान होने के बाद डॉक्टर से जांच का सही समय पूछना बेहतर रहता है.
अस्वीकरण: यह जानकारी केवल सामान्य ज्ञान के लिए है, यह चिकित्सीय सलाह नहीं है. किसी भी लक्षण या चिंता के लिए योग्य डॉक्टर से सलाह लें.