मुश्किल में भाजपा बस्तर के बाद सरगुजा क्षेत्र में चिंतन शिविर की तैयारी
रायपुर। छत्तीसगढ़ की सत्ता में आदिवासियों की भूमिका अहम होती है। प्रदेश की एक तिहाई आबादी और एक तिहाई विधानसभा सीटों पर कांगेस का दबदबा है। भाजपा इन क्षेत्रों में घटती पकड़ को लेकर सरकार का घेरने की कोशिश कर रही है। बस्तर के बाद अब सरगुजा में चिंतन शिविर की तैयारी में जुटी है। इधर सरकार अपनी योजनाओं के मदद से इन क्षेत्रों में पकड़ मजबूत करने में लगी है। बस्तर और सरगुजा में आदिवासियों से संबंधित योजनाओं का लाभ आदिवासियों को मिले इसे लेकर उनके संस्कृति से लेकर हर कार्यक्रम में उन्हें सरकार अपने उपस्थिति का अहसास करा रही है।
बस्तर से लेकर सरगुजा तक कई मसलों को लेकर आदिवासी समाज को सरकार के विरोध में खड़े करने सरगुजा के परसा कोल ब्लॉक के अलॉटमेंट का विरोध, लेमरू एलीफेंट रिजर्व एरिया में विस्थापन, या फिर बस्तर में बोधघाट परियोजना, बैलाडीला के नंदीमाइंस और सिलगेर आंदोलन से सरकार की मुश्किलें बढ़ाने के प्रयास में लगी है। भाजपा इन सभी मुद्दों को हवा देने का प्रयास करने में जुटी है। आने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर भाजपा ने चिंतन शिविर के माध्यम से आदिवासी क्षेत्रों को साधने की कोशिश में लगी है। बस्तर के बाद अब सरगुजा क्षेत्र में चिंतन शिविर करने जा रही है।
आदिवासियों की जमीन वापसी से लौटी रौनक
राज्य सरकार लगातार आदिवासियों का विश्वास जीतने की कोशिश में लगी है इसके तहत 52 प्रकार के लघु वनोपजों की समर्थन मूल्य में खरीदी, स्थानीय लोगों को भर्ती में प्राथमिकता के लिए कनिष्ठ चयन आयोग का गठन, तेंदूपत्ता संग्राहकों को 4000 हजार रुपए प्रति मानक बोरा दिया जा रहा है। ऐसी लगभग 20 से अधिक छोटी बड़ी योजनाएं शुरु की गई हैं।
नाराजगी दूर करने में जुटी राज्य सरकार
बस्तर से लेकर सरगुजा तक कई मसलों को लेकर आदिवासी समाज सरकार का विरोध कर रहा है। सरगुजा के परसा कोल ब्लॉक के अलॉटमेंट को लेकर विरोध जारी है। वहीं, लेमरू एलीफेंट रिजर्व एरिया में विस्थापन का मुद्दा हो या फिर बस्तर में बोधघाट परियोजना और बैलाडीला के नंदीमाइंस का मुद्दा, आदिवासी समाज में नाराजगी है। सिलगेर आंदोलन ने तो सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। सिलगेर मामले में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने अपनी ओर से पहल कर आदिवासियों से चर्चा कर उन्हें सरकार की हर योजनाओं का लाभ दिलाने का आश्वासन दिया है। उन्होंने इन क्षेत्रों में सुरक्षा बलों की कार्रवाई के दौरान नक्सली घटनाओं की कमी का होने से विकास कार्यो और मूलभूत सुविधाओं के विकास का भी भरोसा उन्हें दिया है। अब इन क्षेत्रों में अधोसंरचना निर्माण से लेकर अन्य कार्यों को तेजी से जमीन पर उतारर जा रहा है।
आदिवासी क्षेत्रों विशेष भर्ती
आदिवासी समुदाय को 2012 तक सरकारी नौकरियों में 20 फीसदी आरक्षण दिया जाता रहा। आबादी के प्रतिशत के अनुसार 32 फीसदी आरक्षण के लिए आदिवासियों ने 13 साल संघर्ष किया। राज्य की आबादी में 32 फीसदी आदिवासी हैं। अन क्षेत्रों में कनिष्क सेवा चयन बोर्ड के माध्यम से वहां के निवासियों की सरकारी नौकरी में भर्ती के लिए प्रक्रिया शुरू हो गई है। अब उन्हें अपने क्षेत्र में ही नौकरी देकर सरकार उनके मनोबल को और बढ़ाएगी।
आदिवासी क्षेत्रों में कांग्रेस की बढ़त
भाजपा के दो आदिवासी विधायक हैं। इनमें कोरबा से ननकीराम कंवर और गरियाबंद से डमरूधर पुजारी हैं। बस्तर और सरगुजा में भाजपा के पास एक भी विधायक नहीं हैं। राज्य बनने के बाद भाजपा ने आदिवासियों के लिए आरक्षित 23 सीटें जीती थीं। 2008 में 19 और 2013 में 11 सीटों पर जीत हासिल की थी। 2018 में कांग्रेस ने आदिवासियों के लिए आरक्षित 29 में से 25 सीटों पर जीत दर्ज की।
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