छत्तीसगढ़ के चार चिन्हारी – नरवा, गरवा, घुरवा अऊ बाड़ी-ऐला बचाना है संगवारी
कृषि आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सुदृढ़ीकरण तथा उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों जैसे- नरवा (नदी-नाला), गरवा (पशुधन), घुरवा (जैविक खाद) एवं बाड़ी के समन्वित विकास से कृषि उत्पादन और किसानों के आमदनी बढ़ाने के लिए छत्तीसगढ़ में अभिनव प्रयास किया गया है। छत्तीसगढ़ के चार चिन्हारी – नरवा, गरवा, घुरवा अऊ बाड़ी-ऐला बचाना है संगवारी की परिकल्पना से ग्रामीण क्षेत्रों की दशा में आमूलचूल परिवर्तन आएगा और ग्रामीण स्वावलंबन की अर्थव्यवस्था की दिशा में अच्छा कार्य होगा। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इस परिकल्पना केे विभिन्न पहलुओं को अपने दीर्घ अनुभव की कसौटी पर सफलतापूर्वक परखा है। उनका मानना है कि ग्रामीण क्षेत्र के लोग पहले गांव के बाहर से केवल नमक लेते थे और शेष जरूरत की सभी चीजें गांव में ही पैदा कर लेते थे, लेकिन आज गांव के लोग रोजगार तथा सामग्री के लिए शहरों की ओर भाग रहे हैं। इसे बदलने की जरूरत है। मुख्यमंत्री का ये भी मानना है कि इस योजना से छत्तीसगढ़ के ग्रामीण क्षेत्रों में आमूलचूल परिवर्तन होगा। यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था की दृष्टि से छत्तीसगढ़ को देश का मॉडल राज्य बनाएगा।
नरवा :
प्रदेश के ग्रामीण अंचलों में जल स्त्रोतों, नालों के उदगम स्थल से शुरूआत करते हुए जरूरत के अनुसार जल संचयन एवं संवर्धन हेतु कच्ची एवं पक्की संरचनाओं का निर्माण करना। इसके लिए वैज्ञानिक ढंग से सैटेलाईट इमेज एवं जीआईएस मैप का उपयोग कर किया जाएगा। छोटे संरचना, बोल्डर, चेक-डेम इत्यादि को बढ़ावा दिया जाएगा। ग्रामों के तालाब एवं जल संरचनाओं को सोलर पंप एवं पाईप लाईन के माध्यम से भरा जावेगा। वर्तमान नदी-नालों तालाबों का संधारण, जीर्णोद्धार व गाद हटाने की कार्रवाई की जाएगी। इसके तहत सरफेस वॉटर जैसे नदी-नालों और तालाबों के साथ जमीन के नीचे के जल को सुरक्षित बनाएं रखने पर जोर दिया जा रहा है। इससे यह लाभ होगा कि नदी-नालों-तालाबों का पुनरोद्धार होकर जल स्तर में वृद्धि होगी, जिससे अधिकाधिक द्विफसलीय उत्पादन संभव हो सकेगा। साथ ही साथ जल स्त्रोतों में बारह महीने पानी सुनिश्चित हो सकेगा तथा भू-गर्भ जल में वृद्धि होगी।
गरवा:
हर ग्राम में तीन एकड़ भूमि का चयन कर दिन में गौठान में पशुओं के रहने हेतु प्रबंधन की उचित व्यवस्था की जाएगी। ये गोठान पशुधन के लिए ‘डे केयर सेन्टर’ की तरह कार्य करेंगे। गौठान हेतु ऊंची भूमि जहां 2-4 बड़े वृक्ष हो, इसका चयन किया जाएगा। भूमि को सुरक्षित कर फेसिंग एवं सीपीटी कार्य कराये जाएंगे। इसकी परिधि व गौठान में वृक्षारोपण किया जाएगा। गौठान में पशुओं के बैठने के लिए पक्का प्लेटफार्म, बछड़ों, बीमार पशुओं एवं चारा के लिए शेड, पीने के पानी हेतु टंकी आदि बनाई जाएंगी। जल की उपलब्धता सुनिश्चित करने नलकूप खनन कराकर सोलर पंप लगाए जाएंगे। गौठान में बंधियाकरण एवं नस्ल सुधार को बढ़ावा दिया जायेगा। इससे यह लाभ होगा कि ग्रामीण क्षेत्रों में पशुओं के चरने से फसल को नुकसान होता है। इस प्रकार सामूहिक गौठान में पशुओं को सुरक्षित रखने से फसलों की सुरक्षा होगी और उत्पादन में बढ़ोतरी होगी। गौठानों में कृत्रिम गर्भाधान से पशुओं की नस्ल में सुधार को बढ़ावा मिलेगा, जिससे ग्रामीण अंचलों में उन्नत किस्म के पशुओं की उपलब्धता होगी और दूध उत्पादन में बढ़ोतरी होगी।
घुरवा :
गौठान में सामुदायिक आधार पर बायो गैस प्लांट, कम्पोस्ट इकाईयां, चारा विकास एवं दुध संग्रहण केन्द्र बनाए जाएंगे। बायो गैस प्लांट से ग्रामवासियों को गैस की सुविधा मुहैया कराई जाएगी। गौठान के पशुओं के गोबर से जैविक खाद का उत्पादन होगा। साथ ही सामुदायिक बायोगैस की स्थापना की जाएगी, जिससे कम लागत में अधिक फसल उत्पादन एवं ऊर्जा उत्पादन सुनिश्चित होगा। इससे रोजगार बढ़ने के साथ-साथ कृषि की उत्पादकता और गुणवत्ता का भी विकास होगा। यहां पैरा कटिंग मशीन भी लगाने पर जोर दिया गया है, जिससे पशुओं को अच्छा आहार मिले। गांव में चारागाह विकास पर भी जोर दिया गया है, जिससे पशुओं को ज्यादा से ज्यादा समय तक हरा चारा मिलें। इससे पशुओं के गोबर को एकत्रित कर गोबर गैस प्लांट में उपयोग करने के साथ-साथ घुरूवा निर्माण में और सहुलियत प्राप्त होगी, जिससे अधिक मात्रा में जैविक खाद का उत्पादन होगा। खादों के उपयोग करने हेतु हर किसान को अवसर प्राप्त होगा। जैविक खाद के उत्पादकता से पौष्टिक और गुणवत्ता में बढ़ोतरी होगी।
बाड़ी :
हर गांव में उद्यानिकी और कृषि की विभिन्न योजनाओं व गतिविधियों से उद्यानिकी फसलों/सब्जी का उत्पादन हर घर के बाड़ी में लिया जाएगा। आवश्यकताओं के अनुरूप साग-सब्जी बीजों आदि का विेतरण किया जाएगा। नदी नालों के किनारे फलदार वृक्षों का रोपण किया जाएगा। जैविक खाद के माध्यम से फसलों की उत्पादकता बढ़ेगी, रोजगार के अवसर बढेंगे तथा सब्जी, फल आदि पोषकयुक्त कृषि उत्पाद बढ़ने से स्वास्थ्य पर भी अच्छा प्रभाव पड़ेगा। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में साग-सब्जियों के उत्पादन को बढ़ावा देने से किसानों की आमदनी में वृद्धि होगी, इतना ही नहीं ग्रामीण परिवारों के लिए पौष्टिक आहार उपलब्ध होगा। हर गांव में बीज वितरण से साग-सब्जियों एवं फलों के उत्पादन को बढ़ावा दिया जाएगा, जिससे किसान परिवार अपने बाड़ी में साग, सब्जियों एवं फलों का उत्पादन कर सकेंगे।
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