भाजपा की केंद्र सरकार ने खेला पिछड़ा कार्ड, अब कांग्रेस का भूपेश पर भरोसा
2018 में कांग्रेस ने तीन राज्यों में जीत दर्ज की थी, इनमें मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ शामिल था। अब मध्य प्रदेश भाजपा के पास वापस चला गया, राजस्थान में खुली जंग है और छत्तीसगढ़ आपसी कलह में सुलग रहा है। छत्तीसगढ़ कांग्रेस में सीएम की कुर्सी को लेकर मचे सियासी घमासान को खत्म करने के लिए पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने मुख्यमंत्री पद के लिए ढाई-ढाई साल का फार्मूला तय किया और भूपेश बघेल पहले सीएम बन गए। अब ढाई साल पूरे हो चुके हैं और बारी टीएस सिंहदेव की है, लेकिन मामला फंस गया है। दोनों नेताओं के बीच कलह को रोकने के लिए दोनों नेताओं को अगस्त में दिल्ली तलब किया गया। छत्तीसगढ़ कांग्रेस में कुर्सी के संघर्ष को लेकर स्थिति क्या है, इसे समझना जरूरी होगा। दरअसल केंद्र सरकार पिछड़ों के फेवर में राजनीति कर रही है। कांग्रेस के सामने अब इसे तोड़ने के लिए कोई विकल्प नहीं है। तीन राज्य में से छत्तीसगढ़ में ही पिछड़े वर्ग के रूप में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के हाथों में बागडोर सौंपी गई है। इधर आने वाले साल में उत्तरप्रदेश का विधानसभा चुनाव है। यहांं पर पिछड़ों को साधने का प्रयास भाजपा करने लगी है। ऐसे में कांग्रेस मुख्यमंत्री बदलती है तो उन्हें वहां पर नुकसान उठाना पड़ सकता है। पार्टी नेतृत्व इसी असमंजस में फंसी है। इससे ढाई-ढाई साल के फार्मूला टालता भी जा रहा है।
कांग्रेस के पास भूपेश का विकल्प नहीं
छत्तीसगढ़ में 15 साल बाद कांग्रेस सत्ता में लौटी है। रमन सरकार को उखाड़ने की रणनीति में प्रदेश अध्यक्ष के रूप में भूपेश बघेल और चुनाव घोषणा पत्र बनाने में टीए सिंहदेव की बड़ी भूमिका रही। जय-वीरू की जोड़ी ने ऐसी रणनीति बनाई कि पार्टी ने उम्मीद से ज्यादा सीट जीत कर सत्ता हासिल कर ली। कांग्रेस आलाकमान को भरोसा नहीं था कि ऐसा चमत्कार हो सकता है। ऐसे में उन्हें किसानों और पिछड़ा वर्ग के लोगों पर ही भरोसा करने के अलावा कोई विकल्प नहीं रहा। सरकार अपने कामकाज के केंद्र बिंदु में इन्हीं वर्गों को लेकर आगे बढ़ रही है।
भारी पड़ सकता है मुख्यमंत्री को हटाना
फिलहाल दोनों ही नेता आलाकमान के किसी भी फैसले को मानने के लिए खुद को राजी दिखा रहे हैं। लेकिन ऐसे में सवाल उठता है कि केंद्रीय नेतृत्व किन पेचीदगियां में उलझा हुआ है कि वो फैसला लेने में इतनी लेटलतीफी कर रहा है? जानकारों का कहना है कि सिंहदेव जिस तरह दबाव बना रहे हैं उससे लगता है कि पार्टी ने उन्हें ढाई साल बाद मुख्यमंत्री बनाने का वादा किया था। लेकिन अब बघेल की मजबूत स्थिति की वजह से पार्टी किसी भी तरह के जोखिम को आमंत्रण देने से परहेज करने में लगी है। बघेल गुट का मानना है कि विधानसभा चुनाव से पहले अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) से आने वाले मुख्यमंत्री को कुर्सी से हटाना पार्टी को भारी पड़ सकता है। राजस्थान और पंजाब का उदाहरण देते हुए यह कहा जा रहा है कि अगर सरकार में नेतृत्व परिवर्तन होता है तब छत्तीसगढ़ कांग्रेस में भी इन राज्यों के जैसे बिखराव हो सकता है।
कांग्रेस सरकार को कोई खतरा नहीं
90 में से 70 विधानसभा सीटों में कब्जे की वजह से भले ही कांग्रेस शासित अन्य राज्यों के मुकाबले छत्तीसगढ़ में सरकार सुरक्षित है। मगर स्थिति को समय रहते दुरुस्त नहीं करने की रणनीति आगे परेशानी का सबब जरूर बन सकती है। राज्य में फिलहाल मुख्यमंत्री के बदले जाने के संकेत भले ही ना मिले हों, लेकिन भूपेश बघेल की पूरी पारी खेलने की बात भी आलाकमान की ओर से साफ तौर पर नहीं कही गई है। कई मोर्चों पर मुख्यमंत्री बघेल और मंत्री सिंहदेव के बीच टकराव वाली स्थितियां भी निर्मित होती रही हैं। जब तनाव ज्यादा बढ़ने लगा तब दोनों नेताओं को दिल्ली तलब किया गया। माना जा रहा है कि टीएस सिंहदेव ‘ढाई साल वाले वादे’ को लेकर आलाकमान पर दबाव बनाने में जुटे हैं, तो मुख्यमंत्री भूपेश बघेल भी अपनी मजबूत स्थिति दिखा रहे हैं। भारी भरकम बहुमत वाली छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार पर किसी किस्म का कोई खतरा नहीं है।
किसानों के साथ न्याय ही है भूपेश की ताकत
किसानों और भूमिहीन लोगों को न्याय देने के लिए कई योजनाएं शुरू कर सरकार ने उनका हर पल साथ देने का निर्णय लिया है। योजनाओं के मामले में सरकार को कोई मदद नहीं मिली ऐसे में ऋण का सहारा लेकर अपने वादों को पूरा करने का प्रयास किया जा रहा है। नरवा, गरवा, घुरवा, बारी को लेकर प्रदेश सरकार ने इसमें कई विभागों के बजट से काम शुरू किया, जिससे अब इनसे जुड़े सभी वर्गों को न्याय देने का प्रयास किया जा रहा है। किसानों के कर्ज माफी से लेकर, उनकी उपज खरीदने के बाद शेष बचे राशि का भुगतान करने तक किसान न्याय योजना से पूरी की गई। गरवा को फलीभूत करने गोधन न्याय योजना लाकर सरकार ने गौपालकों और अन्य वर्ग को दायरे में लाया है। अब प्रदेश में बचे भूमिहीन किसानों का पंजीयन कर उन्हें 6 हजार रुपए देने का निर्णय लिया है। योजनाओं से ग्रामीण क्षेत्र में सरकार ने अपनी पैठ बनाने में सफलता पाई है। वनवासी क्षेत्रों में लघु वनोपज की समर्थन मूल्य में खरीदी और वहां पर प्रसंस्करण उद्योगों को बढ़ावा देकर उन्हें रोजगार से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।
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