प्लास्टिक खाने वाला बैक्टीरिया एंजाइम दिखाती लैब में मिट्टी और प्लास्टिक सैंपल की जांच

पर्यावरण के लिए एक बड़ी उम्मीद जगाने वाली खोज सामने आई है. वैज्ञानिकों को जंगल की मिट्टी में एक ऐसा बैक्टीरिया एंजाइम मिला है, जो प्लास्टिक को तोड़ने के साथ-साथ एंटीबायोटिक दवाओं को भी तोड़ सकता है. यह प्लास्टिक खाने वाला बैक्टीरिया एंजाइम दो अलग-अलग तरह के प्रदूषण से निपटने में मददगार साबित हो सकता है. वैज्ञानिक इसे भविष्य के लिए एक बड़ा हथियार मान रहे हैं.

खोज की शुरुआत कैसे हुई

रिसर्च टीम पौधों के तेल से बने एक खास बायोप्लास्टिक पर काम कर रही थी. उन्होंने इस बायोप्लास्टिक की पट्टियां जंगल की मिट्टी में दबा दीं. करीब एक साल तक इन्हें वहीं रहने दिया गया. जब बाद में इन पट्टियों की माइक्रोस्कोप से जांच हुई, तो सतह पर बैक्टीरिया के आकार के छोटे-छोटे गड्ढे दिखाई दिए. इससे साफ हो गया कि सूक्ष्मजीव प्लास्टिक की सतह को धीरे-धीरे खा रहे थे.

प्लास्टिक खाने वाला बैक्टीरिया एंजाइम कैसे मिला

इसके बाद वैज्ञानिकों ने उसी मिट्टी के सैंपल में एक खास जीन की तलाश शुरू की. यह जीन सिर्फ उसी मिट्टी में बड़ी मात्रा में मौजूद था, जहां प्लास्टिक की पट्टियां दबाई गई थीं. यह जीन एक एंजाइम बनाता है, जिसे एस्टरेज़ कहा जाता है. इस एंजाइम की खास बात यह है कि यह बैक्टीरिया की सतह से बाहर निकलकर काम करता है, लेकिन फिर भी बैक्टीरिया की सतह से जुड़ा रहता है.

दो तरह के काम एक साथ

जांच में सामने आया कि इस एंजाइम की बनावट बीटा-लैक्टामेज नाम के एंजाइम जैसी है. बीटा-लैक्टामेज वही एंजाइम है, जो पेनिसिलिन जैसी एंटीबायोटिक दवाओं की खास संरचना को तोड़ सकता है. लैब टेस्ट में वैज्ञानिकों ने पाया कि यह एक ही एंजाइम दो अलग काम कर सकता है. यह प्लास्टिक को छोटे-छोटे हिस्सों में तोड़ सकता है, और साथ ही पेनिसिलिन को भी तोड़ सकता है. यही वजह है कि इसे “पैक-मैन एंजाइम” जैसा नाम दिया गया है.

यह खोज क्यों है इतनी अहम

आम प्लास्टिक को मिट्टी में सड़ने में सैकड़ों साल लग जाते हैं. इस दौरान यह टूटकर माइक्रोप्लास्टिक बनाता है, जो मिट्टी, पानी और यहां तक कि इंसानी शरीर में भी पहुंच जाता है. दूसरी तरफ, एंटीबायोटिक दवाओं का बचा हुआ अंश भी पर्यावरण में जमा होकर बैक्टीरिया को दवा-प्रतिरोधी बना सकता है. एक ऐसा एंजाइम मिलना, जो दोनों समस्याओं से निपट सके, वैज्ञानिकों के लिए दोहरी उपलब्धि है.

आगे इस्तेमाल में कैसे आ सकता है यह एंजाइम

फिलहाल यह खोज लैब स्तर पर ही साबित हुई है. असली दुनिया में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल के लिए अभी और रिसर्च की जरूरत होगी. वैज्ञानिकों की उम्मीद है कि भविष्य में इस एंजाइम का इस्तेमाल कचरा प्रबंधन संयंत्रों में किया जा सकता है, जहां बायोप्लास्टिक कचरे को तेजी से तोड़ा जा सके. इसके अलावा दवा फैक्ट्रियों के आसपास के पानी में बचे एंटीबायोटिक अंश को साफ करने में भी यह मददगार हो सकता है.

आम लोगों के लिए इसका क्या मतलब है

यह खोज सीधे तौर पर आम इंसान की रोजमर्रा की जिंदगी को अभी नहीं बदलेगी, लेकिन यह पर्यावरण के भविष्य के लिए बड़ी उम्मीद जरूर बनकर आई है. प्लास्टिक प्रदूषण और दवा-प्रतिरोधी बैक्टीरिया, दोनों आज की दुनिया की बड़ी चुनौतियां हैं. अगर यह एंजाइम बड़े स्तर पर काम करने लायक साबित होता है, तो आने वाले सालों में कचरा प्रबंधन का तरीका पूरी तरह बदल सकता है.

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