अक्सर संगीत शब्द सुनते ही हमारा मन गाना गुनगुनाने लगता है। हमारे दिमाग में गाने आने लगते हैं। लेकिन संगीत का मतलब केवल गाने से नहीं है। ‘गीतं वाद्यं तथा नृत्यं त्रयं संगीत मुच्यते’। सुर, ताल और लय के संगम से संगीत बनता है। ये परस्पर एक दूसरे के बिना अधूरे हैं। इसी कड़ी में यदि हम नृत्य की बात करें तो गीत और वादन के साथ किया हुआ नृत्य, मुद्रा-भाव और रूप के साथ खुशियों की वह अभिव्यक्ति है जो नृत्य करने वालों से लेकर इसे देखने वाले को भी प्रभावित करता है। न केवल प्रभावित करता है बल्कि प्रेरित भी कर देता है और ये अनुभूति हम देश के किसी भी प्रांत में कर सकते हैं।

छत्तीसगढ़ में भी सरगुजा से लेकर बस्तर तक वहां की प्रकृति में समाए नदी-नालों और झरनों की अविरल बहती धाराओं की कलकल, बारिश में टिप-टिप गिरती पानी की बूंदे, उफान में रौद्र बहती नदियों की धारा, शांत जंगल में पंछियों का स्वर, चिड़ियों की चहचहाहट, पर्वतों और घने जंगलों से आती सरसराती हवाएं, भवरों का गुंजन, भवरों की गुंजन से लेकर पेड़ो से गिरते हुए पत्तों और हवा चलने पर सरकते सूखे पत्तों की सरसराहट, इन सब में संगीत समाहित है।

लेकिन हम इंसानों की ये विडंबना है कि हम इन प्रकृति और प्रकृति के बीच से उठती धुनों को सुन नहीं पाते। हम संगीत की इस भाषा से परे हैं। लेकिन जब हम इनके बीच कुछ वक्त गुजारते हैं तो ऐसा महसूस होता है कि मानों जंगलों, नदी, पर्वतों, वन्य जीवों की भी सुख-दुख से जुड़ी अनगिनत कहानियां है। ये सभी अपनी भाषाओं, अपनी शैलियों में गीत गाते हैं, नाचते हैं, झूमते हैं। लेकिन हमारे बीच एक ऐसी जनजातियां है या एक ऐसा समाज है जो इन्हें जीता है। या यूं कह लें की इन्हीं में अपना जीवन जीता है, वो है आदिवासी समाज। प्रकृति का ये गीत और नृत्य इनके आसपास रहने वाले जनजातियों की संस्कृति में घुल-मिलकर वाद्य यंत्रों के सहारे हमें नृत्य के साथ देखने और समझने को मिलता है।

ये जनजातियां और आदिवासी ही हैं जो हमें प्रकृति की भाषा समझने में सहायक हैं। ये प्रकृति के पुजारी हैं। प्रकृति के प्रति प्रेम क्या होता है ये इनसे बेहतर कोई नहीं जान सकता। इनकी परंपराएं, इनकी संस्कृति, इनकी कला अनूठी है और इसे बढ़ावा देने का काम छत्तीसगढ़ सरकार कर रही है। आदिवासी नृत्य महोत्सव के माध्यम से देशभर के लोगों को एक बार फिर जुड़ने का मौका मिलेगा।

इस महोत्सव में देशभर के अलग-अलग राज्यों से कलाकार जनजाति समाज सहित अन्य परिवेश के नृत्यों की रंगारंग प्रस्तुतियां देंगे। छत्तीसगढ़ का नृत्य वास्तव में बहुत प्राचीन और समृद्धशाली होते हुए लोक कथाओं से जुड़ा हुआ है और ये केवल मनोरंजन मात्र के लिए नहीं है। इन नृत्यों में आस्था, विश्वास और धार्मिक कथाओं का संगम भी है। ऋतुओं के स्वागत, परिवार में बच्चे के जन्म, विवाह सहित अन्य बहुत से पर्व को उल्लास के साथ मनाने के लिए ये गीत गाए जाते हैं और नृत्यों का प्रदर्शन किया जाता है। इनमें आदिवासी समाज के पुरूष और महिलाओं की समान सहभागिता से सम्मिलित होती हैं। जो कि ये दर्शाता है कि खुशी के साथ अगर अपनी संस्कृति को मिला दिया जाए तो उसका मजा दोगुना हो जाता है।

छत्तीसगढ़ राज्य के अनेक नृत्य है। जो राज्य ही नहीं देश-विदेश में भी अपनी पहचान रखते हैं। प्रकृति के नैसर्गिक वातावरण में रहने वाले इन जनजातियों के अलग-अलग जातीय नृत्य हैं। इनमें माड़ियों का ककसार, सींगों वाला नृत्य, तामेर नृत्य, डंडारी नाचा, मड़ई, परजा जाति का परब नृत्य, भतराओं का भतरा वेद पुरुष स्मृति और छेरना नृत्य, घुरुवाओं का घुरुवा नृत्य, कोयों का कोया नृत्य, गेंडीनृत्य प्रमुख है। मुख्यतः पहाड़ी कोरवा जनजातियों द्वारा किए जाने वाले डोमकच नृत्य आदिवासी युवक-युवतियों का प्रिय नृत्य है। विवाह के अवसर पर किये जाने वाले इस नृत्य को विवाह नृत्य भी कहा जाता है। यह नृत्य छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति का पर्याय है।

इसी तरह राज्य में गेड़ी नृत्य भी प्रसिद्ध है। मुरिया जनजाति के सदस्य नवाखानी पर्व के दौरान लगभग एक महीने पहले से गेड़ी बनाना शुरू कर देते हैं। गेड़ी नृत्य सावन महीने के हरियाली अमावस्या से भादो महीने की पूर्णिमा तक किया जाता है। गेड़ी नृत्य नवाखानी त्यौहार के समय करते हैं। इसमें मुरिया युवक बांस की गेंड़ी में गोल घेरा में अलग-अलग नृत्य मुद्रा में नृत्य करते हैं। नाट्य और नृत्य का ये सम्मिलित रूप गंवरमार नृत्य मुरिया जनजाति द्वारा किया जाता है।