सुकमा जैसा धुर नक्सल प्रभावित क्षेत्र इन दिनों विकास के नए आयाम गढ़ रहा है। रोजगार सृजन से लेकर जीवकोपार्जन तक, सुकमा हर चीज में आगे बढ़ रहा है। सुकमा की धरती इन दिनों वाकई हीरे-मोती उगल रही है। इस जिले में 83.18% आदिवासी जनजातियां रहती हैं। पहले ये आदिवासी अपने घर की बाड़ियों में सीमित रूप में सब्जी उत्पादन किया करते थे। कम उत्पादन के चलते ये जिला पड़ोसी राज्यों पर भी निर्भर हुआ करता था। लेकिन अब कहानी बदल रही है। सब्जी उत्पादन के क्षेत्र में सुकमा अब आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ा रहा है।

बाड़ी विकास योजना

भूपेश सरकार की नरवा, गुरवा, घुरवा, बाड़ी योजना ने किसानों और ग्रामीणों को एक प्रोत्साहन दिया है। बाड़ी विकास योजना इसका एक जीवंत उदाहरण है। इससे किसानो को तो फायदा हो ही रहा है, इसके अलावा क्षेत्र के लोगों को भी अब सहुलियत हो रही है। इसके अलावा ग्रामीणों की आजीविका में भी सुधार आया है। साथ ही कुपोषण से लड़ने में भी जिला अग्रिणी रहा है। इसी का नतीजा है कि जो कुपोषण स्तर 48.21 प्रतिशत था, वो अब 30.04 पर आ गिरा है।

बाड़ी विकास योजना

सपनों को लगे पंख

बाड़ियों का विकास कर ग्रामीण सफलता की कहानी रच रहे हैं। सब्जियों से होने वाली आय से कोई बाइक खरीद रहा है, तो कोई गहने ले रहा है। बाड़ी विकास ने ग्रामीणों के सपनों को पंख लगाने का काम किया है। इसका श्रेय प्रदेश सरकार को भी जाता है, जिसने अंतिम पंक्ति के लोगों के जेब में पैसा पहुंचाने का काम किया है।