कम बारिश होने की वजह से सूखे की मार झेल रहे छत्तीसगढ़ की जनता और जनता के हितों को छोड़कर जिम्मेदार अपना हित साधने में लगे हैं। मौजूदा स्थिति में छत्तीसगढ़ के 12 ऐसे जिले हैं जो सूखा प्रभावित होने की कगार पर हैं। वहां के किसानों को राहत देने के लिए राज्य सरकार ने पैकेज की घोषणा भी की है। उसके लिए राजस्व विभाग का पूरा अमला काम पर भी लग गया। लेकिन सोचने वाली बात ये है कि क्या सही तरीके से सभी 12 जिलों के सूखा प्रभावित किसानों को उनके हक का मुआवजा मिल पाएगा? खासतौर पर तब जब जिस सरकार का एक सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा पूरी तरह से पिछले महीनों से बंद पड़ा हो ?

छत्तीसगढ़ का पंचायत विभाग मानों कुछ दिनों से बंद पड़ा है. प्रदेश के कुछ जिलों में सूखे जैसे हालात हैं, लेकिन विभाग के मुखिया यानी मंत्री टीएस सिंहदेव जैसे इससे कुछ फर्क ही नहीं पड़ रहा है। महराजा तो रायपुर से दिल्ली और दिल्ली से रायपुर की दौड़ में लगे हैं।

अंतत: काम शुरू तो हुआ

करीब पिछले 2 महीने से राज्य में मची उथल-पुथल के नायक बाबा साहब के कप्तान बनने के चक्कर में 17 जुलाई के बाद से उनके सभी विभागों का काम धाम छोड़कर वे दिल्ली के चक्कर काट रहे हैं। लगभग 26 दिनों के बाद पिछले दिनों वापस रायपुर आ कर बाबा साहब ने अपने विभागों की समीक्षा बैठक शुरू की जिससे पूरे राज्य को बड़ी राहत मिली, कि चलो लंबी छुट्टी के बाद ही सही दोबारा काम तो शुरू हो गया।

फोन ने भंग कर दी बैठक !

लेकिन जनता की यह खुशी ज्यादा देर तक नहीं रह सकी। काम शुरू होने के 36 घंटे भी नहीं बीते थे कि पंचायत विभाग की एक महत्वपूर्ण बैठक के बीच में ही दिल्ली से बाबा को फोन आता है और बैठक को बीच में ही रद्द करके सरगुजा महाराजा दिल्ली उड़ जाते हैं।

पंचायत विभाग की क्या जिम्मेदारी बनती है?

सूखा प्रभावित किसानों के लिए मुआवजे की घोषणा से कुछ घंटे पहले ही दिल्ली का दंगल खत्म हुआ था। जिसके बाद मुख्यमंत्री ने प्रभावित इलाकों के किसानों को राहत देते हुए 9000 प्रति एकड़ मुआवजा देने की घोषणा की थी और मुआवजा सही तरीके से पहुंचे उसके लिए पंचायत विभाग की भी तो कोई जिम्मेदारी बनती है। लेकिन इसी विभाग की महत्वपूर्ण बैठक को बीच में ही रोक देना भला कहां का न्याय है ? हाईकमान का फोन आने पर महाराज ने जनता के हितों के लिए चल रही बैठक बीच में ही रद्द कर दी।

कुर्सी बड़ी या जनता का दर्द ?

तो क्या हाईकमान के बुलावे पर जनता के हितों को ताक पर रखा जा सकता है! क्या हाईकमान का बुलावा जनता के दर्द से ज्यादा बड़ा है! खास तौर पर तब जब वही जनता जिसकी वजह से हाईकमान भी है और कुर्सी भी।