दंतेवाड़ा। 75 दिनों तक चलने वाला विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा का मंगलवार को समापन हुआ। बस्तर की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी माई की डोली बस्तर दशहरा के 5 दिन के उत्सव के बाद वापस दंतेवाड़ा के लिए विदा हुई। अष्टमी के दिन मां दंतेश्वरी की प्रतिनिधि के रूप में मावली माता की डोली बस्तर दशहरा में शामिल होने जगदलपुर आई थी। जहां से बस्तर दशहरा मनाने के बाद मां मावली की डोली को धूमधाम से विदा किया गया।
मंगलवार को बस्तर दशहरा पर्व की एक और महत्वपूर्ण रस्म कुंटुब जात्रा की रस्म निभाई गई। इस रस्म में बस्तर राजपरिवार और ग्रामीणों की अगुवाई में बस्तर संभाग के ग्रामीण अंचलों से पर्व में शामिल होने पंहुचे सभी ग्राम के देवी-देवताओं को ससम्मान विदाई दी गई। शहर के गंगामुण्डा वार्ड स्थित पूजा स्थल पर श्रध्दालुओं ने अपनी मन्नतें पूरी होने पर बलि चढ़ाई।


ग्राम देवी-देवताओं की विदाई
बस्तर दशहरा पर्व में शामिल होने पंहुचे सभी ग्राम देवी-देवताओं के छत्र और डोली को बस्तर राजपरिवार और दशहरा समिति ने समम्मान विदाई दी। पंरपरानुसार दशहरा पर्व मे शामिल होने संभाग के सभी ग्राम देवी-देवताओं को न्यौता दिया जाता है। जिसके बाद पर्व की समाप्ति पर कुंटुब जात्रा की रस्म निभाई जाती है। देवी-देवताओं के छत्र और डोली लेकर पंहुचे पुजारियों को बस्तर राजकुमार और दशहरा समिति की ओर से रूसूम भी दी जाती है। जिसमें कपड़ा, पैसे और मिठाईयां होती है। बस्तर में रियासतकाल से चली आ रही ये पंरपरा आज भी पूरे विधि-विधान से निभाई जाती है।
बस्तर राजपरिवार के सदस्य ने की पूजा
इस पर्व में पूरे संभाग के सैकड़ों देवी-देवताओं के साथ-साथ ग्रामीण भी शामिल होते हैं। इन सभी देवी-देवताओं को बस्तर दशहरा में न्योता आमंत्रण देने की रस्म के साथ ही इनकी विदाई भी ससम्मान की जाती है। बस्तर राजकुमार कमलचंद भंजदेव ने ग्रामीण क्षेत्र से सभी देवी-देवताओं के छत्र और डोली की विधि-विधान से पूजा अर्चना की। इसके बाद सभी देवी-देवताओं और ग्रामीणों को विदा किया।
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