शिकायत के बाद कृषि विभाग के छापे से कीमतें हुई कम
केंद्र ने छत्तीसगढ़ राज्य को मांग के अनुरूप खाद की सप्लाई नहीं की। खरीफ फसल की बोनी के समय यूरिया और डीएपी की जरूरत ज्यादा पड़ती है। राज्य सरकार द्वारा किसानों को समितियों के माध्यम से कम दरों पर खाद उपलग्ध कराया जाता है। राज्य सरकार ने केंद्र से 7.25 लाख टन की मांग की गई थी। इसके विरूद्ध अब तक 6.85 लाख टन रासायनिक खाद की सप्लाई की गई।
मार्कफेड को खाद मिलने के बाद समितियों को उनकी मांग के अनुरूप खाद दी जाती है। निजी दुकानों में स्टॅाक और उनक ों दएि जाने वाले लायसेंस के आधार पर रासायनिक खाद का आबंटन होता है। शासन के द्वारा उनके स्टॉक की जांच की जा सकती है। फसल बुआई के बाद किसानों को समितियों में खाद की किल्लत को देखते हुए निजी खाद दुकानों में उसे मनमाने दाम पर बेचने की शिकायतें आने लगी। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के निर्देश पर जिला कृषि अधिकारियों को अपने क्षेत्र की रासायनिक खाद दुकानों की जांच के निेर्देश दिए गए। जिला अधिकारियों ने इस पर कार्रवाई शुरू की। एक सप्ताह में प्रदेश के दस जिलों के एक हजार से अधिक दुकानों पर जांच में पता चला कि खाद दोगुने से अधिक दरों पर बिक रहा था। इन जिलों में बिलासपुर, कोरबा, रायपुर, बलरामपुर, रायगढ़, मुंगेली, कवर्धा, बलौदाबाजार, दुर्ग-भिलाई, महासमुंद में लगातार जांच की जा रहे हैं। कई दुकानें सील की गई हैं। कालाबाजारी में लगे वाहन जब्त कर दिए हैं। कई विक्रेताओं को नियम विरुद्ध खाद में यूरिया, पोटाश और फिर डीएपी बेचते हुए पकड़ा गया।
समितियों में खाद के दाम
प्रदेश की सहकारी समितियों में खाद का दाम केंद्र सरकार द्वारा तय की गई कीमतों पर किसानों को दिया जाता है। यहां पर एक बोरी यूरिया 266, डीएपी 1200, एनपीके 1185, सिंगलसुपर फास्फेट पावडर 340, सिंगलसुपर फास्फेट दानेदार 370 और जिंक पावडर 355 रुपए प्रति बोरी बकि रहा था। केंद्र की सप्लाई कम होने के कारण कई समितियों में खाद की किल्लत के कारण इसकी कमी हो रही थी।
सख्ती के बाद घटे दाम
कमी का फायदा उठाकर जिले के खाद दुकानों में इसकी कीमतें काफी अधिक बढ़ा दी। किसान मजबूरी में अधिक दरों पर खरीदने में मजबूर हो गए। शासन का इसकर शिकायत मिलने के बाद प्रशासन की सख्त कदम उठाने में मजबूर हो गई और खाद विक्रेताओं ने कीमतें घटाई। यूरिया के दाम कम कर दिए हैं। अब कई जगह 700 रुपए तक में बिकने वाला यूरिया 400 तक में मिल रहा है। समितियों में मिलने वाली दर से अब भी ज्यादा है।
इस कारण किसान होते हैं मजबूर
फसल के सीजन में सोसायटियों से कहीं ज्यादा प्राइवेट विक्रय केंद्रों से खाद का उठाव होता है। ज्यादातर किसान ऐसे भी हैं, जो रेगहा में खेत दूसरों को सौंप देते हैं। खाद की खाताबही में लक्ष्य के हिसाब से खाद वितरण किया जाता है, लेकिन रेगहा लेने वाले किसानों को मजबूरन प्राइवेट विक्रय केंद्र जाने की मजबूरी होती है। इस सीजन में बाहर से डेढ़ सौ करोड़ रुपए तक का कारोबार होता है।
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