रायपुर। छत्तीसगढ़ की कोदो-कुटकी (लिटिल मिलेट) अब और ज्यादा मजबूती के साथ कुपोषण से लड़ सकेगी। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय ने भाभा एटामिक रिसर्च सेंटर (बार्क), मुंबई के साथ मिलकर करीब पांच साल तक लगातार अनुसंधान कर कोदो व कुटकी की कई नई किस्म विकसित की है। इसमें छत्तीसगढ़ी कुटकी में 16 फीसद तक आयरन की मात्रा मिली है। साथ ही प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा, खनिज, कैल्शियम, फस्फोरस जैसे अन्य पोषक तत्वों की मात्रा भी बेहतर है।

रेडी टू ईट फूड

विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिक कोदो, कुटकी, रागी, चीना, काकुन और साभा से रेडी टू ईट फूड बनाया है जिसे खाने से कुपोषण कम हो जाएगा। रेडी टू ईट के फूड प्रोसेसिंग के लिए भी बार्क की मदद ली जा रही है। कोदो-कुटकी की इस खास किस्म का निर्यात भी किया जाएगा, जिसकी तैयारी चल रही है।

छत्तीसगढ़ी कुटकी-1, कुटकी- 2

कृषि विश्वविद्यालय ने छत्तीसगढ़ी कुटकी-1 विकसित की है। यह 85 दिन में पककर तैयार होती है और 12 से 15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज देती है। छत्तीसगढ़ी कुटकी- 2 किस्म 90 दिन में पकती है और इसमें अन्य किस्मों की तुलना में आयरन की मात्रा सर्वाधिक है। प्रति 100 ग्राम में 28 मिलीग्राम आयरन होता है। अन्य कुटकी में देखें तो प्रति 100 ग्राम में प्रोटीन 7.7 मिलीग्राम, कार्बोहाइड्रेट 67.0, वसा 4.7, रेशा 7.6, खनिज 1.5, कैल्शियम 17, फास्फोरस 220 और आयरन 6.0 मिलीग्राम मिलता है।

कृषि विश्वविद्यालय के पादप एवं अनुवांशिक विभाग के प्रोफेसर एवं कृषि वैज्ञानिक डॉ. दीपक शर्मा का कहना है कि कुटकी-2 में सर्वाधिक आयरन मिलने से यह एनीमिक यानी खून की कमी वाले लोगों के लिए कारगर है। कांकेर में जिस तरह कोदो-कुटकी से खिचड़ी बन रही है, उसी के तर्ज पर विश्वविद्यालय के नए किस्मों का भी इस्तेमाल किया जा सकता है। इसी तरह छत्तीसगढ़ी सोन कुटकी भी प्रभावी है। कोदो में इंदिरा कोदो-1, छत्तीसगढ़ी कोदो-2, छत्तीसगढ़ी कोदो-3 समेत अन्य किस्मों से रेडी-टू-ईट फूड बनाया जा रहा है।

कांकेर में कोदो-कुटकी पर प्रयोग

मुख्यमंत्री सुपोषण अभियान के अंतर्गत कांकेर में पांच वर्ष आयु वर्ग के कुपोषित बच्चों और 15 से 49 आयु वर्ग की गंभीर एनीमिक महिलाओं, गर्भवती और धात्री माताओं को सप्ताह में दो दिन कोदो-कुटकी से बनी पौष्टिक खिचड़ी दी जा रही है। कांकेर के महिला एवं बाल विकास अधिकारी सीएस मिश्रा कहते हैं कि इसका प्रारंभिक प्रयोग भी सफल हुआ है। इनमें शुरूआती में 2800 बच्चों कोदो-कुटकी की खिचड़ी दी गई है। इनमें छह महीने में 134 बच्चे पूरी तरह से कुपोषण से मुक्त हुए हैं। अन्य मध्यम स्तर पर आए गए हैं। वहीं, गर्भवती माताओं में भी एनीमिया की दिक्कत नहीं हुई।