छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर स्थित इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय मत्स्य विभाग के द्वारा बायोफ्लाक तकनीक सघन मछलीपालन किया जा रहा है। इसके लिए अपशिष्ट एवं पोषक तत्व प्रबंधन के लिये नवीन पद्धतियों में से एक है जो अल्प जल एवं कम लागत आधारित है। यह तकनीक द्वारा उपलब्ध प्रोबायोटिक के माध्यम से मछली पालन के लिए सीमेंट टैंकों में गुणकारी सूक्ष्मजीवों का धनत्व बढ़ाकर मछलियों के अपशिष्ट नियंत्रित कर उन्हें पोषक तत्व प्रदान करता है। यह तकनीक कई देशों में प्रचलित है लेकिन भारत में इसका विकास अभी प्रारंभ ही हुआ है।
कृषि विज्ञान केंद्र रायपुर के मत्स्यकी वैज्ञानिक द्वारा माह अक्टूबर 2018 से 2 प्रयोग किये गए है जिसमें राज्य में प्रथम बार प्रारंभिक सफलता प्राप्त हुई है एवं रिसर्च पेपर प्रकाशित किया गया है। वर्तमान में यह तकनीक को और अधिक मानकीकृत किया जा रहा है एवं भविष्य में विस्तार किया जाना प्रस्तावित है।
मछली पालन में 5100 लीटर क्षमता के तीन आयाताकार सीमेंटेड टैंकों का उपयोग
केंद्र के मछली पालन इकाई में 5100 लीटर क्षमता के तीन आयाताकार सीमेंटेड टैंकों का उपयोग किया गया। प्रोबायोटिक का उपयोग लाभदायक बैक्टेरिया कालोनियों को विकसित करने और सीमित जल प्रणाली में मछलियों का अपषिष्ट – मूलतः अमोनिया, को नियंत्रित किया गया। पोटेशियम परमैंगानेट के उपचार के साथ स्वस्थ उंगलीआकार (औसत वनज 62 ग्राम) मछलियों को 5 किलोग्राम प्रति टैंक के मान से स्टाक किया गया।
मछलियों को फ्लोटिंग मछली दाना दिन में एक बार लगभग एक प्रतिशत शरीर भार के मान से उपयोग किया गया। उचित बैक्टेरिया कालोनियों के विकास के लिए मोलासेस का उपयोग किया गया एवं पानी में फिजिकोकेमिकल मानकों का नियंत्रण किया गया। अध्ययन में बायोफ्लाक प्रबंधन कर, पानी का न्यूनतम बदलाव एवं केवल 1 प्रतिषत बाहरी पोषण प्रदाय करने पर भी मछलियों के वजन-वृद्धि तालाब में मछलियों के वजन-वृद्धि बराबर पाया गया।
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